Thursday, 27 May 2021

मारवाड़ी छपनियाँ अकाल और महाराजा गंगा सिंह जी

 


अरे!यह राजा सनकी और आत्ममुग्ध है।भला ऐसी भी क्या?जिद जिसका कोई आधार ही नही है।जिस रेगिस्तान को प्यासा रहने का श्राप लगा हो उसे यह मीठे पानी से नहलायेगा....


यह भला कैसे सम्भव है.


तभी लोगो ने एक दुर्लभ दृश्य देखा और अपने प्रजावत्सल राजा की जय जयकार करने लगे.


जिस फोटोग्राफर ने वह दुर्लभ तश्वीर कैद की वह आज भी बीकानेर संग्रहालय में रखी हुई है और मेरी दृष्टि में बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण तश्वीर में से एक है।उस तश्वीर में तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड इरविन उद्घाटन कर रहे है।महामना पंडित मदनमोहन मालवीय पुरोहित बनकर मंत्रोच्चारण कर रहे है और उस राजा के हाथ मे हल है जिसने अपनी प्रजा को पानी के संकट से मुक्ति दिलाने के लिए असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया.


तभी लोगो ने कहा कि जिस रियासत का राजा अपनी प्रजा के लिए खुद मजदूर बन जाये उसका मनोरथ पूर्ण होने से स्वम् ब्रह्मा भी नही रोक सकते.


उस राजा का पुरा नाम था हिज हाइनेस महाराजाधिराज राज राजेश्वर नरेन्द्र शिरोमणि केसर-ए-हिंद महाराजा श्री गंगा सिंह बहादुर रियासत ऑफ बीकानेर.


राजा तो छोटी रियासत के थे लेकिन रुतबा बड़ा था इतना बड़ा की दुनिया के सुपर लीडर के साथ डिनर टेबल पर बैठते थे।राजनीतिज्ञ इतने बड़े थे कि पेरिस शांति सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया बहादुर इतने की प्रथम विश्व युध्द में ओटोमन सम्राज्य को टक्कर दे दी,रहीश भी उस हद के की जब लंदन जाते तो वहां का अभिजात्य वर्ग पलक पावड़े बिछाकर स्वागत करता।बात में वजन इतना होता कि सम्राट जॉर्ज पंचम भी उनकी बात को नही टालते दिलेर इतने की महामना पंडित मदनमोहन मालवीय तारीफ करते नही थकते.


इतिहास में कुख्यात छप्पनिया अकाल ने मारवाड़ की कमर तोड़ कर रख दी तो राजा ने पूरा राजकोष प्रजा पर लुटा दिया लेकिन वह प्रयास राजा को काफी नही लगा और अब राजा ने रेगिस्तान में ही एक नहर लाने की जिद कर डाली।अंग्रेजो से नजदीकियां थी उसका फायदा उठाकर पंजाब से सतलुज का पानी लाया गया पानी को तरसती मारवाड़ की धरती ने पहली बार मीठा पानी चखा और राजा की कलयुग के भगीरथ के नाम से ख्याति हुई.


पंडित मदनमोहन मालवीय का गंगनहर के उद्घाटन कार्यक्रम में पुरोहित बनने की भूमिका भी एक दिलचस्प घटना से लिखी गई।उस समय पंडित जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए देशभर के राजाओं के पास जाकर चंदा इकठ्ठा कर रहे थे और इसी सिलसिले में पंडित जी का बीकानेर पधारना हुआ।राजा सुबह कर्ण की बेला में दिल खोलकर दान दिया करते थे तभी उस दिन कतार में पंडित जी को देखा तो राजा चकित रह गए।पंडित जी से पधारने का प्रयोजन पूंछा तो पण्डित जी ने कहा कि विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए बहुत अधिक धन कम पड़ रहा है।राजा और पंडित जी की पहले से ही गहरी मित्रता थी तो राजा ने तुरंत कह दिया कि आगे से विश्विद्यालय निर्माण के लिए जो भी धन खर्च होगा वह मैं दूंगा आप बेफिक्र होकर काशी पधारिये और निर्माण पूरा करवाइये।महामना राजा के प्रति कृतज्ञ थे और गहरे मित्र भी सो विश्वविद्यालय का पहला कुलपति राजा को ही नियुक्त कर दिया।जब राजा ने गंगनहर के निर्माण की नींव रखी तो वैदिक पूजन के लिए महामना से बेहत्तर पुरोहित भला कौन हो सकता था.


प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लीग ऑफ नेशन का गठन हुआ।दुनिया भर के देशो की लिस्ट बनाई जा रही थी।तत्कालीन गवर्नर जनरल मांटेग्यू चेम्सफोर्ड जब लीग ऑफ नेशन में भारत का नाम शामिल करवाने को दुनिया के ताकतवर देशों के नेताओ से मिले तो उन्होंने यह कहकर भारत का नाम शामिल करने से मना कर दिया कि भारत एक गुलाम देश है और ब्रिटिश इंडिया जैसे किसी स्वायत देश का धरती पर अस्तित्व ही नही है।हताश और निराश चेम्सफोर्ड जब महाराजा गंगा सिंह से मिले तो महाराजा ने कहा कि अगर आप कहो तो इसके लिए एक कोशिश मैं कर लेता हूँ.


बाद में मांटेग्यू ने अपनी डायरी में लिखा कि मुझे नही पता महाराजा ने दुनिया के नेताओ से उस वक्त क्या कहा लेकिन कुछ ही देर बाद ब्रिटिश इंडिया का नाम भी लीग ऑफ नेशन में शामिल हो गया.


साभार : इस लेख के लिये तथ्यात्मक जानकारी श्री राजवीर सिंह चलकोइ (इतिहास विशेषज्ञ स्प्रिंगबोर्ड अकेडमी जयपुर) के एक वीडियो से ली गई है.


✍ लोकेन्द्र सिंह

Saturday, 8 May 2021

महाराणा प्रताप- पर्वतीय जीवन विशेष


भारत के हिन्दुआ सुरज, प्रातः वंदनीय महाराणा प्रताप सिंह की 481 वी जयंती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻


अभी कुछ दिन पहले एक राजनेतिक पार्टी विशेष के नेता द्वारा महाराणा प्रताप पर आपतिजनक बयान दिया गया चलिए आज  महाराणा प्रताप जंयती के अवसर पर उसी विषय पर थोडी जानकारी साझा करते हॆ के महाराणा प्रताप जंगलो मे भटकने की सच्चाई क्या हॆ 👇🏻


हल्दीघाटी से समबन्धित महाराणा प्रताप की गाथाएँ तो बडी महत्वपूर्ण हॆ लेकिन उनसे कही अधिक गॊरवपुर्ण वे गाथाए हॆ जो उनके पर्वतीय जीवन पर प्रकाश डालती हॆ,प्रताप के देशभिमान,स्वार्थत्याग,दुरदर्शिता,ऒर रणकॊशल के अध्ययन के लिए हमे उन घटनाओ को समझना चाहिए जिनका समबन्ध उनकी पहाडी स्थिती से हॆ,

इस स्थिति से सम्बन्धित घटनाए जॆसे महारानियो का चट्टानो पर सोना ,उनके पुत्र अथवा पुत्री की रोटी को बिलाव द्वारा छिना जाना इत्यादी बातो को बढा चढाकर लिखा गया हॆ ,हम जानते हॆ की  प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध ऒर उनके देहावसान के बीच का समय अधिकांश पहाडो पर गुजरा ,यदी हम प्रताप को समझना चाहते हॆ तो हमे उन पहाडो पर जाना होगा जहां वर्षो रहकर प्रताप ने मुगलो का मुकाबला किया ऒर अपने देश की सुव्यवस्था की,ये पहाड आजी भी प्रताप के सच्चे स्वरुप को हमारे सामने उपस्थित करते हॆ ।

हल्दीघाटी की पराजय को महाराणा प्रताप ने कभी पराजय नही माना बल्कि इस पराजय के बाद उन्होने पर्वतीय जीवन ऒर युद्ध नीती का नया पृष्ठ आरम्भ किया। लडाई के मॆदान से वे सीधे उन पहाडो मे गये जहा पानी ,अन्न,ओर ऒषधि उपबल्ध थी। इन पहाडो मे कोल्यारी नाम का गांव था वहा पहुंचकर उन्होने घायल सॆनिको का उपचार करवाया । इन्ही से उन्हे अपने देश की सुरक्षा की आशा थी । यह स्थान निर्जन वन मे था जहां मुगल सेना का पहुंचना कठिन था । यहां प्रताप ने पहले ही रसद एंव अन्य सुविधाओ को जुटाकर रखा था ।कुछ समय यहा रहकर उन्होने घायल सिपाहियो की देखभाल की ऒर उन्हे स्वस्थ बनाया।


इसके पश्चात भीतरी गिरवा के पहाडी नाको पर इन सिपाहियो  को लगाया जिन्होने गोगुन्दा मे टिकी हुई शाही सेना की रसद को बन्द कर दिया । विजयी मुगल एक तरह से यहां कॆदियो की भांति जीवन बिताने लगे ,अपने घोडो ऒर ऊंटो को मारकर  खाने लागे इसके अतिरिक्त वहां पॆदा होने वाला खट्टा आम ही उन मुगलो के जीवन का आधार बना ,विवश होकर मुगल सॆनिक छिप छिप कर भागने लगे ऒर इस प्रकार से मुगलो की विजय पराजय मे बदल गयी ,राजा मान सिंह आमेर एंव बदायुनी जब अजमेर पहुचे तो अकबर ने उनकी अपेक्षा की ऒर यह इस बात का प्रमाण हॆ की प्रताप की पर्वतीय नीती ने मुगलो की नीती को विफल बना गया था।


मुगलो को गोगुन्दा से निकालने से ही महाराणा प्रताप संतुष्ट नही थे ,उन्होने कुम्भलगढ से लगाकर सहाडा  तक तथा गोडवाल से लेकर आंसीद ऒर भॆसरोडगढ के पर्वतीय नाको पर भीलो की विश्वस्त पालो को बसा दिया जो दिन रात मेवाड की चोकसी करते थे ,इन भील जत्थो के साथ अन्य सॆनिक भी थे जो मुगलो को मेवाड मे घुसने से रोकते थे ,

इस सम्पुर्ण व्यवस्था को सफल बनाने के लिए महाराणा को राजप्रासाद के जीवन से तिलांजली देनी पडी ,वे पहाडी कन्दराओ ऒर जंगलो मे अपने परिवार के साथ रहना ही अपने जीवन का अंग बना लिया ,

कभी वे एक पहाडी पर थे तो कभी दुसरी पर ,यह मुगलो से छिपने की विधी न थी वरन एक नयी युद्ध पद्धति थी जिसने भविष्य मे होने वाले मुगल हमलो को विफल बना दिया 

इस पद्धति मे जमकर लडाई करने का कोई महत्व नही दिया जाता। जिसका परिणाम यह हुआ की मुगल जो मॆदानी लडाई मे अभ्यस्त थे वे इस प्रणाली को समझ ना सके, यही कारण था के कुतुबुद्दीनखां , मिर्जाखां, हाशिमखां शाहबाजखां आदि मुगल जो उतरोतर मेवाड की ऒर भेजे गये कभी सफल नही हो सके, यहां तक की अकबर खुद गोगुन्दा आया ऒर राणा प्रताप की तलाश मे लगा रहा परन्तु अपने प्रयत्नो को विफल होकर गुजरात की ऒर निकल गया।


महाराणा प्रताप की सफलता केवल नाकेबन्दी के कारण न थी ,उन्होने अपने पर्वतीय जीवन काल मे स्थानीय  जन समुदाय से अच्छा सम्बन्ध स्थापित कर लिया था ,महाराणा प्रताप के कठिन व्रत एव कष्टपुर्ण जीवन बिताने से लोगो को बडी प्रेरणा मिली ,वे महाराणा के आत्मीय बन गये ऒर हर प्रकार से उनको सहयोग देने लगे । एक तामपत्र के आधार पर यह प्रमाणित होता हॆ के इस पर्वतीय जीवन काल मे महाराणा सकुटुम्ब क ई दिन तक एक लुहार के घर मे रहे थे, उसके सॊजन्य ऒर आतिथ्य के सम्मान मे उन्होने उसे खेती के लिए भुमी भी दी थी ,जो उसके वंशजो के अधिकार मे अब तक थी 


इस पर्वतीय जीवन के काल मे महाराणा ने वे स्थान जो उनके आदेश से खाली कर दिये थे जहां शत्रुओ के द्वारा बडी हानी पंहुची थी या जिन्हे अग्नि का ग्रास बना दिया गया था उन्हे फिर से आबाद किया गया । उदाहरणार्थ पीपली,ढोलान,टीकड,आदि गांव जो उजड गये थे उन्हे फिर से बसाया गया ,लोगो को नयी जमीने दि गयी ,जमीन के नये पट्टे बना दिये गये ,ऒर जो पुराने पट्टे जल गये थे या लुप्त हो गये थे उनको पुन: मान्यता दी गयी 

इस नीती व प्रयत्नो को सफल बनाने के लिए प्रताप पहाडी इलाको मे ही रहते थे ,उदयपुर को राजधानी बनाकर या मोती नगरी के राजप्रासादो मे प्रताप नही रहे ,उन्होने जनता के आराम के लिए अपने आराम की परवाह नही की ,इस व्यवस्था से मेवाड का जनजीवन ,व्यापार,वाणिज्य, आदि साधारण स्थिति पर पहुंच गये ,मुगलो के हमलो की प्रगति भी धीरे धीरे शिथिल होती गयी ।


इस प्रकार जब मेवाड की हालत सुधरती चली गयी तो प्रताप ने सहाडा के जिले मे एक पर्वतीय भाग जिसे छप्पन इलाका कहते थे वहां लुणा चावण्डिया को परास्त कर अपने अधिकार मे लिया ,यह भाग चारो ऒर उंची पर्वतमाला  से घिरा हुआ था  जिसमे घने जंगल तथा पर्वत घाटियो ऒर नाको का बाहुल्य था 

सन 1985ई. मे महाराणा ने इस भाग मे स्थित चावण्ड नामक एक पहाडी कस्बे को अपनी राजधानी बनाया ,उनके जीवन काल तक ही नही वरन उनके सुपुत्र अमर सिंह के राज्यकाल मे 1615ई. तक चावण्ड मेवाड की राजधानी बना रहा ,यहां प्रताप ने अपने महलो का निर्माण करवाया तथा उसके आसपास सामन्तो की हवेलिया बनवाई ,महलो के खण्डर आज भी बताते हॆ कि उनमे विलासिता या वॆभव का कोई दिखावा नही रखा गया था उनकी बनावट मे सरल जीवन तथा सुरक्षा के साधनो को प्रधानता दी गयी थी,जगह जगह मोर्चो की सुविधाए ,की गयी ,

राजप्रासाद तथा हवेलियो के खण्डरो को देखने से प्रतीत होता हॆ की शासक तथा अधिकारी वर्ग के मकानो मे कोई विशेष अन्तर नही था । यदी अन्तर था तो केवल उनके आकार मात्र का ।


महाराणा प्रताप का अन्तिम जीवन भी इसी पर्वतीय भाग मे समाप्त हुआ ,चावण्ड से डेड मील के अन्तराल पर बण्डोली गांव के पास मे महाराणा का दाह संस्कार हुआ जहां एक स्मारक बनवाया गया ,आज यह स्मारक एक बांध के गर्भ मे हॆ बडे प्रयासो के बाद यह स्मारक पानी से उपर उठाया गया जो उस निर्भिक स्वतंत्रता के पुजारी की हमे याद दिलाता हॆ जिसने पर्वतीय जीवन बिताकर तथा कठोरता का हंसकर सामना कर अपने देश के मान ऒर मर्यादा की रक्षा की ।🙏

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साभार - विजय सिंह शेखावत (सिंगोद)


Saturday, 23 May 2020

बेटी भी श्रवण सी होती है..।।


एक बेटी श्रवण बनी है बोझ जिंदगी का ढोती है,
क्या विकासशील देश में मजदूरों की हालत यही होती है..।।

रोता मन रोती मेहनत धूप भी सूरज की रोती है,
शिखर दुपहरी में जब एक बेटी श्रवण बन चलती है..।।

धूप में जलता बचपन लेकिन राजनीति कुलर में सोती है,
चित्र देख उमड़ते ख्याल आखिर जिंदगी कितनी कठिन होती है..।।

मिल जाता है सरकार का साथ जिनके पास इसकी कीमत होती है,
ये भारत है मेरी जान यहाँ मजदूरों की किस्मत यूँ ही रोती है..।।

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

✍🏻 कुँवर चेतन सिंह चौहान "कलम"

Wednesday, 13 May 2020

निमूचाणा हत्याकांड - इतिहास के पन्नो से


अलवर का नीमूचाना कांड जिसमे 156 राजपूत किसानो को मशीनगन से भून दिया गया और 600 से ऊपर घायल हुए।

जलियांवाला कांड जिसमें लगभग ढाई सौ लोगो की मौत हुई थी उसके बाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था नीमूचाना में। महात्मा गांधी ने इसे जलियांवाला हत्याकांड से भी ज्यादा भयानक बताया था। भारत के इतिहास में किसी भी किसान आंदोलन में इतने लोग नही मरे जितने नीमूचाना में एक दिन में मारे गए। इसके बावजूद अगर आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो इस कांड के बारे में कोई खास जानकारी आपको नही मिल पाएगी। यहां तक कि भारत के किसान आंदोलनों या स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास भी आप पढ़ेंगे तो उसमे मुश्किल ही नीमूचाना कांड का जिक्र आपको मिलेगा।

यहां तक कि राजस्थान के किसान आंदोलनों या तथाकथित रियासत विरोधी/स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में भी इस कांड को पर्याप्त महत्व नही दिया जाता। राजस्थान में इतने कृत्रिम किसान आंदोलनो को 47 के बाद से पब्लिक डिस्कोर्स में  प्रसिद्धि दिलाई हुई है जिनमे जान माल की मामूली हानि हुई थी और उनके स्मारक बने हुए हैं, वर्षगांठ मनाई जाती हैं, इन आंदोलनों के नेता प्रसिद्धि पाकर मंत्री मुख्यमंत्री तक बने लेकिन इन सभी किसान आंदोलनों को मिलाकर भी उतनी जनहानि नहीं हुई जितनी अकेले नीमूचाना हत्याकांड में हुई लेकिन शायद ही इस कांड के शहीदों को याद किया जाता हो।नीमूचाना कांड को महत्व ना दिए जाने के पीछे खुद राजपूत समाज की उदासीनता भी कारण हैं क्योंकि स्थानीय राजपूत समाज मे इतिहास बोध ना के बराबर है।

अलवर रियासत क्योंकि अंग्रेजो के आगमन के कुछ समय पूर्व ही अस्तित्व में आई थी इसलिए वहां राजपूत जागीरदारों की संख्या अभी कम ही थी और जागीर भी बेहद छोटी थीं। 80% भूमि खालसा में थी। इस खालसा में बिसवेदार भी थे। बिसवेदार वो किसान होते थे जो खालसा में आते थे लेकिन उनको अपनी जमीन पर स्थायी मालिकाना हक मिला होता था। उन्हें कर ना चुकाने पर ही बेदखल किया जा सकता था। बिसवेदारो में ज्यादातर राजपूत थे जिन्हें सैनिक सेवा के बदले अलवर दरबार ने बिसवेदारी दीं थी। अंग्रेजो के अधीन होने के बाद राजपूत जागीरदारों और बिसेदारो पर दरबार की निर्भरता खत्म होने से दरबार और आम राजपूतो के संबंध और शिथिल हो गए।

1923-24 के नए भूमि बंदोबस्त में अलवर राज्य ने राजपूत किसानों के बिसवेदारी अधिकार जब्त कर लिये और कर की दरें बढ़ाकर 50% तक कर दी। यह अलवर दरबार द्वारा राजपूतो के साथ धोखा था जबकि रियासत को अब भी राजपूतो को अनिवार्य सैन्य सेवा में बुलाने का अधिकार था। राजपूतो को अनिवार्य सैन्य सेवा के कारण रियायतें दी जाती थीं। उन्हें अपना सामाजिक स्तर भी बनाए रखना होता था। ब्राह्मणो को भी दी जाती थीं हालांकि उन्हें सिर्फ ब्राह्मण होने के कारण रियायत मिलती थी। राज्य को उनसे कोई सेवा नही मिलती थी।

राज्य की इस व्यवस्था के विरुद्ध थानागाजी और बानसूर तहसील के राजपूत बिसवेदारो ने इकट्ठे होकर नई दरों पर कर नही देने और इसके विरुद्ध आंदोलन करने का निर्णय लिया। दबाव बनाने के लिए अक्टूबर 1924 में राजपूतो ने विभिन्न गांवों में बैठके की लेकिन इसका राज्य पर कोई असर नही हुआ।

इसके बाद आंदोलन के नेताओ ने राज्य के बाहर के राजपूतो का समर्थन जुटाने का निर्णय लिया। देशभर के राजपूतो से अपील की गईं। जनवरी 1925 में दिल्ली में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में अलवर से 200 राजपूत शामिल हुए। इन्होंने वहां अपनी व्यथा सुनाई और आंदोलन को समर्थन की अपील की। इन्हें अधिवेशन में सहानुभूति मिली और आंदोलन को जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिला।

इसके बाद यह आंदोलन तीव्र हो गया। गवर्नर जनरल के एजेंट को फरियाद की गई। लेकिन राज्य को कोई फर्क नही पड़ा। कर ना देने पर राज ने फसल जब्त कर लीं जिसे राजपूतो ने ताकत के बल छुड़ा लिया। अब राज सरकार द्वारा प्रतिकार की संभावनाओं को देखते हुए राजपूतो ने तलवार, भाले, बंदूक वगैरह जुटाने शुरू कर दिए। जो राजपूत अलवर राज के वफ़ादार थे और उसकी सबसे बड़ी ताकत थे वो ही अब अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। राजपूतो ने इस अन्याय का मुकाबला करने का फैसला किया।

आंदोलन का मुख्य केन्द्र नीमूचाना गांव था जिसके ठाकुर इस आंदोलन के मुख्य संगठन कर्ता थे। मई 1925 की शुरुआत में राजपूत बड़ी संख्या में इस गांव में जुटने शुरू हो गए। सरकार ने थानागाजी, बानसूर, मालाखेड़ा, राजगढ़, बहरोड़ थाना क्षेत्रो में हथियार लेकर घूमने पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार ने 7 मई को नीमूचाना गांव में वार्ता के लिए एक कमिशन भेजा जिसका असली उद्देश्य खुफिया जानकारी इकट्ठा करना था। इस कमिशन की वार्ता से कुछ हासिल नही हुआ और 6 दिन बाद 13 मई को राज्य की सेना ने गांव को चारों तरफ से घेर लिया और आंदोलन खत्म करने को कहा। 14 मई की सुबह सेना ने सारे रास्ते बंद कर बिना चेतावनी के गांव पर मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी और गांव को जलाकर राख कर दिया जिसमे 156 राजपूत किसान मारे गए और 600 से ज्यादा घायल हुए।

इस हत्याकांड की देशभर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। देशभर के समाचार पत्रों में लेख लिखे गए। महात्मा गांधी ने इसे जलियावांला से भी ज्यादा भयानक बताया। लेकिन क्योंकि अंग्रेजी राज के परिणामस्वरूप बने नए शहरी उच्च मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस के द्वारा राजपूतो को अस्पृश्य समझा जाता था इसलिए इस हत्याकांड की आलोचना की सिर्फ औपचारिकता निभाई गई। हालांकि सरकार ने हत्याकांड के बाद अपने फैसले वापिस लिए और मृतकों के परिजनों को मुआवजे दिए गए।

यह कहा जाता है कि अलवर महाराज पर अंग्रेज सरकार का दबाव था। अंग्रेज सरकार उन्हें हटाने के बहाने ढूंढती रहती थी। और असहयोग आंदोलन के बाद अंग्रेजी सरकार ने आंदोलनों से सख्ती से निपटने का फैसला किया हुआ था। लेकिन इस सबके बावजूद इतने बड़े हत्याकांड के लिए किसी भी बहाने से किसी को दोषमुक्त नही किया जा सकता।
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लेखक- पुस्पेंद्र राणा
साभार - वीरेंद्र प्रताप सिंह सोलंकी

Saturday, 18 April 2020

विश्वगुरु बनता मेरा हिंदुस्तान



कहते है कि समयचक्र खुद को दोहराता है और आज वही वक्त है जब मेरे देश का स्वर्णिम युग पुनः अपने तेज से प्रकाशित होने लगा है। एकतरफ जहां पूरी दुनिया कोरोना नामक संक्रमण से त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है वही दूसरी तरफ भारत के प्रयासों से बीमारी ने अबतक देश मे अपना विकराल रूप नही दिखाया है।

कहते है एक सर्वोत्तम नेतृत्व ही अपने देश को उन ऊंचाइयों पर ले जाता है जहां से पूरा विश्व नतमस्तक होकर उसे प्रणाम करने लगता है। आजसे पहले भी कई बार ऐसा हुआ है जब विदेशी शक्तियों ने हिंदुस्तान के आगे झुककर उसे नतमस्तक होकर प्रणाम किया है व हिंदुस्तान का साथ मांगा है। लेकिन आज समय अलग है स्तिथियाँ अलग है। जब मेडिकल क्षेत्र में महारथ हासिल कर चुके देश कोरोना के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गए तब एकमात्र देश भारत ने अब तक कोरोना को घुटनों पर लाकर टिका दिया।
देश की सरकार, पुलिस, फौज, स्वस्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी व अन्य कोरोना योद्धाओं ने जिस प्रकार अपने पूर्ण समपर्ण से देश का साथ दिया उसी का आज ये परिणाम है कि स्विट्जरलैंड जैसे देश ने अपने मैटरहॉर्न पर्वत को हिंदुस्तान के रंग में रंग दिया।

ये प्रमाण है कि मेरा देश आज फिरसे विश्वगुरु बनने को तैयार है और आने वाले समय में हिंदुस्तान पुनः विश्वशक्ति के रूप में अपने आपको स्थापित करेगा।

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जयहिंद
जय भारत

✍🏻 *कुँवर चेतन सिंह चौहान*

Thursday, 2 April 2020

लॉक डाउन - निर्णायक युद्ध




जैसा कि आप सबको पता है 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बाद 26  मार्च से सम्पूर्ण देश मे लॉक डाउन को लागू कर दिया था। कुछ लोगो को सरकार का ये फैसला सही लगा तो कुछ लोगो को गलत लेकिन असल मे लॉक डाउन की क्या आवश्यकता रही होगी जो मेरी सोच के अनुसार ये है-

लॉक डाउन का कारण- चीन के वुहान से निकले एक कोरोना वायरस (Covid-19) ने जब धीरे धीरे विश्व के महानतम देश जो विकसित है, जिनके पास सबसे बेहतरीन चिकित्साप्रणाली है उन्हें तेजी से अपनी चपेट में लेना शुरू किया और मौत का भयानक खेल शुरू हुआ तो भारत के पास इस वैश्विक समस्या से निपटने का एकमात्र रास्ता लॉक डाउन ही बचा था। बेशक भारतीय मेडिकल व्यवस्था भी कमजोर नही है लेकिन इतनी भी उन्नत नही की ऐसी परिस्तिथियो का मुकाबला सिर्फ मेडिकल इक्वेपमेंट्स के आधार पर कर सके इसलिए लॉकडाउन जैसी व्यवस्था को मजबूरन लागू करना ही एकमात्र उपाय रहा भारतीय सरकार के पास।

लॉकडाउन में कमी - बेशक लॉक डाउन ही एकमात्र उपाय था  भारतीय सरकार के पास लेकिन लॉकडाउन की घोषणा के समय गरीब और खासतौर से दिहाड़ी मजदूरों की तकलीफों पर खासा ध्यान न देने से भीड़ का अपने अपने गांवों की तरफ प्रस्थान करना लॉक डाउन की सबसे बड़ी कमी रही। यदि इस वर्ग को विश्वास में लेने का कार्य उचित समय पर और अधिक सजगता से होता तो दिल्ली जैसी हालात किसी भी जगह पर नही होते। लॉकडाउन के समय इन बारीकियों की ओर ध्यान न देना कुछ हद तक कमियां दर्शाता है।

लॉकडाउन का प्रभाव - जिसप्रकार सरकार ने लॉक डाउन की घोषणा की और सम्पूर्ण देश ने एकजुट होकर इसका समर्थन व पालन किया और वर्तमान में कर रही है उसका सीधा सीधा प्रभाव के रहा है कि कोरोना जैसी महामारी जिसने कुछ ही दिनों में अमेरिका जैसी व्यवस्थित व विकसित प्रणाली को घुटनों के बल पर ला दिया वो बीमारी भारत मे अपने उस विस्फोटक स्वरूप में अभी तक नही आ पाई है जिसका खौफ ना केवल भारतीय सरकार अपितु पूरे विश्व को था। ये वायरस अभी तक मुख्यत शहरों में ही सीमित है जिसका एकमात्र कारण सरकार द्वारा सही समय पर लॉक डाउन का फैसला लेना रहा क्योंकि अगर ये बीमारी एकबार गांवों में अपनी जड़ें जमाना शुरू कर देगी तो इसको सम्भालना व इससे बचना बहुत कठिन होगा। इस बीमारी के फैलने से जो स्तिथि उत्पन्न होगी वो बहुत भयावह होगी जिससे देश ना केवल आर्थिक रूप से अपितु मानसिक रुप से भी कई साल पिछड़ जाएगा।

अतः समस्त देशवासियों को आज मिलकर ये शपथ लेनी चाहिए कि जब तक ये विपदा पूर्णतः समाप्त नही हो जाती हमे सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा व सरकार के हर कदम का समर्थन करना होगा। सच्ची देशभक्ति दिखाना सिर्फ बॉर्डर पर जाना नही होता यदि इस विपत्ति काल में आप किसी भी प्रकार से देश की रक्षा करने में आप अपना योगदान दे रहे है तो निश्चित ही आप भी सच्चे देशभक्त है।

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जयहिंद जय भारत
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः
घर रहिए - सुरक्षित रहिए

✍🏻 कुँवर चेतन सिंह चौहान

Wednesday, 15 May 2019

अकबर को बताकर महान तुम्हे तनिक लाज न आई




जिसके नाम से अकबर सपनो में डर जाता था,
एक पड़े भाला तो भीमकाय शत्रु तुरन्त मर जाता था,
जिसकी गर्जना से पूरा आकाश शौर्य से भर जाता था,
वो नाम वीर शूरमा महाराणा कहलाता था,

 महाराणा हारें थे ये बात तुम्हे किसने बताई है,
अकबर महान बताते शिक्षामंत्री तुम्हे तनिक लाज न आई है..।।


हिंदुस्तानी होकर ना जाने क्यों मुगल तुम बन रहे हो,
आखिर किस बात का है घमंड किस अहम में तन रहे हो,
गलत पढ़ाकर आखिर कैसे शिक्षित युवा जन रहे हो,
आखिर क्यों विधर्मी होकर राष्ट्रवादियों से ठन रहे हो,

खुदके शूरमाओं पर उठा रहे उंगली कैसी शिक्षा पाई है,
अकबर महान बताते शिक्षामंत्री तुम्हे तनिक लाज न आई है..।।


जिसदिन रक्त राणा के वंशजों का फिरसे उबाल खायेगा,
पछताओगे तुम कुछ न तुम्हे समझ मे आएगा,
माफी मांगो महाराणा से नतमस्तक हो प्रणाम करो,
कभी तो पढाओं सच्चा इतिहास जाकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार करो,


महाराणा पर उंगली उठाकर तुमने राजस्थानी मिट्टी है लजाई,
अकबर महान बताते शिक्षामंत्री तुम्हे तनिक लाज न आई है..।।।।

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*कुँवर चेतन सिंह चौहान*