Tuesday, 27 February 2024

वर्तमान के अभिमन्यु

 













जिस प्रकार महाभारत में उतराधिकार का संघर्ष हुआ और एक बड़ा युद्ध हुआ ठीक उसी प्रकार एक युद्ध आज हर रोज लड़ा जाता है| नौजवान युवा अपनी जवानी को इस युद्ध में झोंक देते है कुछ सफल हो जाते है कुछ असफलता के भंवर में डूब जाते है| यह युद्ध है आज सरकारी नौकरी लेने का, क्यूंकि वर्तमान समय में आप कामयाब तभी है जब आपके पास सरकारी नौकरी है| सरकारी नौकरी को आज आपके ज्ञान और कामयाबी का पैमाना बना दिया गया है|

इस युद्ध में ना जाने कितने अर्जुन है, कितने अभिमन्यु है और ना जाने कितने कर्ण है| जगह जगह कोचिंग गुरु द्रोणाचार्य बनी हुयी है और एक से एक अर्जुन तैयार करने में लगी है| जिसके पास पैसे नही वो एकलव्य बने हुए है| लेकिन इन सबमे सबसे खास है अभिमन्यु|

अभिमन्यु वो युवा है जो घर के दबाव में, पड़ोसियों के ताने और दोस्तों की कामयाबी को देखते हुए इस युद्ध में उतर तो चूका है लेकिन उसे ये ज्ञात नही की ये पूरा युद्ध ही उसके लिए एक चक्रव्यूह है और इस चक्रव्यूह में उसे सिर्फ आने का रास्ता पता है जाने का नही|

जैसा की महाभारत काल में हुआ था ठीक वैसा ही यहाँ भी होता है रोज ना जाने कितने अभिमन्यु इस चक्रव्यूह में फंसते है और वीरगति को प्राप्त होते है, चक्रव्यूह में आज के अभिमन्यु को घेरे हुए है कोरवो के रूप में घरवालो के ताने, असफलता की निराशा, मां पिता के सपनों का बोझ, पड़ोसियों की कुटिल मुस्कान और मानसिक तनाव| ये सभी मिलकर ना जाने कितने अभिमन्यु को प्रतिदिन मारती है इस चक्रव्यूह में|

ना जाने कब अभिमन्यु की मां निंद्रा को तोड़ेगी और अभिमन्यु इस चक्रव्यूह को तोड़ने की कला सीखेगा| ना जाने कितने अभिमन्यु अभी और इस चक्रव्यूह में फंसके अपने प्राण त्यागेंगे|

ना जाने कब वर्तमान के अभिमन्यु इस चक्रव्यूह को तोड़कर बहार निकलेंगे और विजयश्री प्राप्त करेंगे|

लेखनी – कुंवर चेतन सिंह चौहान


Monday, 17 April 2023

ठाकुर का कुँआ

 


ठाकुर गोरधन सिंह रहते थे सिन्ध के खिपरो में।

नौ बेटे चार बेटियाँ।

जब लगा कि हवा का रुख पलट गया है,

अकेला पड़ता जा रहा है,

आ पहुंचे सिंध से हिन्द!

सैकड़ों गाय, ऊंट भेड़ बकरी!

तलाई सूखी। कब तक दूसरों के भरोसे रहना?


विचार किया कुँआ खोदने का।

जाळ वाली डेहरी में,

चौथ का धूंप किया।

आखा जोया, सुगन बिचारा।

और जेठ की ग्यारस को खुदाई शुरू की।

दो बेटे खोदते, दो मिट्टी खींचते।

अभी आठ पुरुस ही खोदा था कि कुँआ ढह गया!!

हीरा वीरा दब गए।

खेजड़ जैसे पाले पोसे, दो कुंवर जिंदा दफन हो गए।

लाशें निकाली। दाह संस्कार किया।

बारह दिन बिताकर फिर से खुदाई शुरू की।

इस बार चिमिया मेघवाल बुलाया।


एक ऊंट से मिट्टी, दूजे से पखाल, तीजे से बहावलपुर की पक्की ईंटों की ढुलाई शुरू की।

चिमिया चिनाई करता।

जागन चूना घोलता।

तेजा और भूरा कींण भरते।

सतिया और बूलाह खींचते।

इक्कीस पुरुस पर गींया आया।

बयालीस पुरुस पर खुदाई चल रही थी,

अचानक कींण टूटी।

भूरे की कमर ही टूट गई।

मांचे पर डालकर घर लाए।

इग्यारह महीने खुदाई चली।


साठ पुरुस पर पानी आया।

भगवती को भोग लगाया।

पितरों का तर्पण किया।

हीरा और बीरा की आत्मा का तर्पण किया।

चिमिया ने कोठा चुगा।

काठोडी से सिम्पट, खेली, कपूरिया और कोअड़ मंगवाए।


नख्तू सुथार ने ओड़ाक, खीली और भाण बनाया।

तेजा भील ने बरत और कोस दिया।

किसी को ऊँट तो किसी को बळदों की जोड़ी दी।

किसी के कान पीले किये तो किसी की कन्या परणाई।

किसी ने गोखरू घड़ाए तो किसी की सगाई कराई।

पर चिमिया राजी नहीं हुआ।

ठाकुर ने कहा "बोल चिम्मा! क्या चाहता है?"

फोगां वाली डेहरी, पूरे तीन सौ बीघा का खेत लिया।

ठकुराइन बोली "मेरा चिम्मा नाराज नहीं रहना चाहिए, खेत के साथ बैल भी दो!"

और शुद्धनम को कुँआ चालू हुआ।

पहले एक डेरा था, अब बस्ती बस गई।

देश देश के नासेटू आते। पखाल, पनघट, सब चालू रहता।


दिन को धणियों वाला धन पीता।

रात को निधणीके फंडे ढोर पीते।

जंगली जानवर और हिरणियों की प्यास बुझती।

आठ कोस तक के रोल खोल, थके, लंगे, पशु पक्षी, सबकी आशा का सहारा।

गौधूजी का कुँआ।।


मंगनियार हीरा वीरा के झोरावे गाते।

चारपाई पर पड़े हुए भूरे की आंखें गीली हो जातीं।

ठाकुर आंखों से अंधा भी "आये गए" की सार सम्भाल करता।

डेहरी में कोस की धमक गूँजती।

खीली के लिए गोसी की हुंकार होती।

घिरनी की चपड़ चूँ चार कोस तक सुनाई देती।

ऊँटों के बग घमकते, खिज का हुब्बाड़ उठता।

तपेलों में खीर महकती, चिलम के धुंए उठते, खेजड़ी के नीचे चहल-पहल।

दूर दूर के यात्री, अपनी अपनी कथाएं कहते।

दिन तोड़ते, हिसाब करते, पंचायतियां होती।

कतारें रुकती।

दिसावर जाते पंथी और ससुराल जाती बहुएं यहाँ से अपने हलकारे को अंतिम सन्देश के साथ वापस रवाना करतीं।


लोकगीतों में, मिथक में, भयानक यात्राओं में, हिस्ट्री में, मिस्ट्री में, संकेत में, सेना में, चारों तरफ चर्चा में रहा!


ठाकुर वाला कुँआ।

गोधूवाला कुँआ!!

Wednesday, 29 March 2023

रेबारी तुम कब आओगे

 


गर्मियां आ गई लेकिन ढूंढाड़ में रेबारी कब आएंगे ? 

रामजी और रेबारी ढूंढाड से ऐसे रूठ गए कि अब ढूंढाड़ की पूरी रंगत ही बदलती जाती है. बिना पावणो के कैसी तो रंगत और कैसा ढूंढाड.

मेरे गांव के बाहर जंगल में एक चबूतरा बना हुआ है. कोई मारवाड़ का रेबारी सौ बरस पहले ऊंट लेकर ढूंढाड आया था. बीमारी से वह रेबारी स्वर्ग सिधार गया. जिस जगह रेबारी ने प्राण त्यागे वहां गांव वालों ने एक चबूतरा बना दिया और अब तो वह रेबारी एक लोकदेवता की तरह घर - घर में पूजा जाता है. कौन गांव कौन जात किसी को कुछ नही पता. बुजुर्गो से पूछो तो बस इतना बताते है कि मारवाड़ का रेबारी था. ऊंट चराने आया था. बीमारी से मर गया लेकिन बाद में परचे देने लगा और अब तो रेबारी बाबा की बात ही निराली है. भैरू जी और रेबारी दोनो का भोग चूका तो घर में कलेश होना तय है. 

ये केवल मेरे गांव की ही कहानी नही है. ढूंढ़ाड के गांव - गांव में कोई ना कोई रेबारी परचा देता मिल जाएगा. 

पर अब ना तो रेबारी और ना वो ढूंढाड़ 

रामजी की माया कितने दिन टिकनी है ये तो रामजी ही जाने पर बीते कुछ साल से रेबारी और रामजी दोनो ही ढूंढाड से रूठ गए है. 

मुझे तो लगता है कि ढूंढाड़ को मारवाड़ की काली नजर लगी है. ढूंढाड़ के हरियल खेत और सरवर पानी देखकर मारवाड़ कौनसा कुंठित हुए बिना रहा होगा. या फिर ढूंढाड़ को माया इतने दिन ही बदी थी. माया के मद में ढूंढाड़ ने भी मारवाड़ को हमेशा कमतर ही आंका है. 

घर की कोई सयानी छोरी बात का कहा नही मानती थी तो मेरी दादीसा गाली देकर कहती थी कि " रांड को ब्याव मारवाड़ में कर दीज्यो, खाबा ने बाजारों और पीबा ने खारो पाणी मिलेलो " 

मारवाड़ को लेकर ढूंढाड़ में बड़े ही तिरस्कार भरे लोकमत प्रचलित रहे है. ढूंढाड़ी मारवाड़ के लिए कहते आए है कि काया के काले, माया के अभागे और गांठ के कंजूस लोग है. मेरे परदादा जीरे के व्यापारी थे तो मारवाड़ और मरवाडियों में उठना बैठना था. छप्पनिया अकाल के बाद मारवाड़ की ऐसी छवि बनी कि हमारे कोई मारवाड़ी पावणा घर आ गया तो उसको चावल,बुरा और घी खिलाकर मानो उपकार करते थे.  गलती से किसी लड़की का रिश्ता मारवाड़ में हो जाता तो आस पड़ोस की महिलाएं यह डर पहले ही भर देती थी कि " मोटा रिवाज को देस है, सोना का भूखा मिनख है और परदेस की मजूरी है " 

हो भी क्यों ना संवत में तीन फसल काटने वाले ढूंढाड़ी कहते हैं, कि जिसका खलिहान खाली और सयानी छोरी कुंवारी हो वो आदमी तो वैसे भी बिरादरी में मुंह दिखाने के लायक नही है फिर मारवाड़ में तो बाजरी भी भगवान भरोसे होती है. 

बहरहाल, जब दिन फिरते है तो बुरे दिनों कि याद कौन करे. जब रामजी ने दी मौज तो रेबारी ढूंढ़ाड को भला क्योंकर याद करे. उन दिनों को अब कौन याद करे जब गर्मी आते ही मारवाड़ के सेठ - साहूकारों के टांके तक पींदे को धंसते थे फिर भला ऊंट पालने वाले रेबारियों की सुध कौन ले. जिनकी रामजी सुध नही लेता वे ढूंढाड की धरती को चले आते थे. इधर ढूंढाडी अपने खेत खाली करते थे और उधर से रेबारी उंटो को लेकर प्रस्थान करते थे. 

चरने को चारा, पीने को पानी, सुस्ताने छाया की ढूंढाड़ ने रेबारियों को कभी कमी नही आने दी.

मुझे ठीक से याद है गर्मियों में हमारी खेड़ को सब बच्चे मिलकर सुबह उठते ही पूरी भरते थे. पहले उसमे खुद नहाते और फिर रेबारियो के ऊंटो को पानी पीने छोड़ देते. जिस दिन किसी रेबारी का डेरा हमारी खेड़ खाली नही करता तो आसपास रेबारी का डेरा देखकर उसे कहते कि हमारी खेड़ पूरी भरी है. ऊंटों को पानी पिला दो. ताकि कल सुबह उसे फिर से भर दे और हमारे नहाने का जुगाड हो जाए. 

असल में तो ये रेबारी सदियों के सांस्कृतिक दूत थे जो ऊंट चराने के बहाने मारवाड़ की संस्कृति को ढूंढाड़ लेकर आते तो ढूंढाड़ को लादकर मारवाड़ पहुंचाते. मारवाड़ में ऊंट पाबूजी लाए तो ढूंढाड़ में रेबारी. ढूंढाड़ के ऊंट पालक बड़ी बेसब्री से इनका इंतजार करते कि रेबारी आए तो दो चार ऊंट खरीद लें. या फिर ऊंट पालने की तरकीब भी ये रेबारी ही सिखाकर जाते थे. ऊंट को किस बीमारी में कौनसी औषधी काम करती है ये रेबारी से ज्यादा कौन जानता है.

यहां आकर ये रेबारी खूब गपशप करते. नमक मिर्ची लगाकर मारवाड़ के किस्से सुनाते. हमारे मोहल्ले में बैठकर मारवाड़ के ठाकुरों की बातें बताते तो मन राजी होता था. जिस खेत में इनका डेरा होता वहां रात को गांव के सब चिलमबाज मिलते थे. इस लालच में कि रेबारियों की तंबाकू औषधी जैसा काम करती है. 

गूजरो से इन रेबारियों की जोरदार पटती थी. क्योंकि दूध का काम करने वाली गूजर जाति को ये अपना दूध बेचते थे. 

 पूरी गर्मी कलूटी काया पर मटमेले लिबास और माथे पर सतरंगी पगड़ी धरे ये रेबारी इधर - उधर दिखाई पड़ते थे. हमने तो कभी इनसे जात और गांव तक नही पूछा. कोई किसी भी जात और गांव का हो. हमारे लिए वह गांव का मारवाड़ी और जात का रेबारी ही था. 

खैर, अब ढूंढाड़ के दिन लद गए और मारवाड़ में सब बात की मौज है. इन बिन बुलाए पावणों के लिए अब ढूंढाड़ में ना तो हरियल खेत है ना सरवर पानी. अब लाचार ढूंढाड़ खुद सरकार से ERCP की भीख मांग रहा है. 

अब ये रेबारी ढूंढाड़ ऊंट लेकर ढूंढाड़ नही आते और खूब याद करने पर मुझे याद नही आ रहा कि मैने अंतिम बार अपने गांव में ऊंट कब देखा था. 

 

लेखक :- लोकेन्द्र सिंह किलाणौत


 


Thursday, 27 May 2021

मारवाड़ी छपनियाँ अकाल और महाराजा गंगा सिंह जी

 


अरे!यह राजा सनकी और आत्ममुग्ध है।भला ऐसी भी क्या?जिद जिसका कोई आधार ही नही है।जिस रेगिस्तान को प्यासा रहने का श्राप लगा हो उसे यह मीठे पानी से नहलायेगा....


यह भला कैसे सम्भव है.


तभी लोगो ने एक दुर्लभ दृश्य देखा और अपने प्रजावत्सल राजा की जय जयकार करने लगे.


जिस फोटोग्राफर ने वह दुर्लभ तश्वीर कैद की वह आज भी बीकानेर संग्रहालय में रखी हुई है और मेरी दृष्टि में बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण तश्वीर में से एक है।उस तश्वीर में तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड इरविन उद्घाटन कर रहे है।महामना पंडित मदनमोहन मालवीय पुरोहित बनकर मंत्रोच्चारण कर रहे है और उस राजा के हाथ मे हल है जिसने अपनी प्रजा को पानी के संकट से मुक्ति दिलाने के लिए असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया.


तभी लोगो ने कहा कि जिस रियासत का राजा अपनी प्रजा के लिए खुद मजदूर बन जाये उसका मनोरथ पूर्ण होने से स्वम् ब्रह्मा भी नही रोक सकते.


उस राजा का पुरा नाम था हिज हाइनेस महाराजाधिराज राज राजेश्वर नरेन्द्र शिरोमणि केसर-ए-हिंद महाराजा श्री गंगा सिंह बहादुर रियासत ऑफ बीकानेर.


राजा तो छोटी रियासत के थे लेकिन रुतबा बड़ा था इतना बड़ा की दुनिया के सुपर लीडर के साथ डिनर टेबल पर बैठते थे।राजनीतिज्ञ इतने बड़े थे कि पेरिस शांति सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया बहादुर इतने की प्रथम विश्व युध्द में ओटोमन सम्राज्य को टक्कर दे दी,रहीश भी उस हद के की जब लंदन जाते तो वहां का अभिजात्य वर्ग पलक पावड़े बिछाकर स्वागत करता।बात में वजन इतना होता कि सम्राट जॉर्ज पंचम भी उनकी बात को नही टालते दिलेर इतने की महामना पंडित मदनमोहन मालवीय तारीफ करते नही थकते.


इतिहास में कुख्यात छप्पनिया अकाल ने मारवाड़ की कमर तोड़ कर रख दी तो राजा ने पूरा राजकोष प्रजा पर लुटा दिया लेकिन वह प्रयास राजा को काफी नही लगा और अब राजा ने रेगिस्तान में ही एक नहर लाने की जिद कर डाली।अंग्रेजो से नजदीकियां थी उसका फायदा उठाकर पंजाब से सतलुज का पानी लाया गया पानी को तरसती मारवाड़ की धरती ने पहली बार मीठा पानी चखा और राजा की कलयुग के भगीरथ के नाम से ख्याति हुई.


पंडित मदनमोहन मालवीय का गंगनहर के उद्घाटन कार्यक्रम में पुरोहित बनने की भूमिका भी एक दिलचस्प घटना से लिखी गई।उस समय पंडित जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए देशभर के राजाओं के पास जाकर चंदा इकठ्ठा कर रहे थे और इसी सिलसिले में पंडित जी का बीकानेर पधारना हुआ।राजा सुबह कर्ण की बेला में दिल खोलकर दान दिया करते थे तभी उस दिन कतार में पंडित जी को देखा तो राजा चकित रह गए।पंडित जी से पधारने का प्रयोजन पूंछा तो पण्डित जी ने कहा कि विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए बहुत अधिक धन कम पड़ रहा है।राजा और पंडित जी की पहले से ही गहरी मित्रता थी तो राजा ने तुरंत कह दिया कि आगे से विश्विद्यालय निर्माण के लिए जो भी धन खर्च होगा वह मैं दूंगा आप बेफिक्र होकर काशी पधारिये और निर्माण पूरा करवाइये।महामना राजा के प्रति कृतज्ञ थे और गहरे मित्र भी सो विश्वविद्यालय का पहला कुलपति राजा को ही नियुक्त कर दिया।जब राजा ने गंगनहर के निर्माण की नींव रखी तो वैदिक पूजन के लिए महामना से बेहत्तर पुरोहित भला कौन हो सकता था.


प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लीग ऑफ नेशन का गठन हुआ।दुनिया भर के देशो की लिस्ट बनाई जा रही थी।तत्कालीन गवर्नर जनरल मांटेग्यू चेम्सफोर्ड जब लीग ऑफ नेशन में भारत का नाम शामिल करवाने को दुनिया के ताकतवर देशों के नेताओ से मिले तो उन्होंने यह कहकर भारत का नाम शामिल करने से मना कर दिया कि भारत एक गुलाम देश है और ब्रिटिश इंडिया जैसे किसी स्वायत देश का धरती पर अस्तित्व ही नही है।हताश और निराश चेम्सफोर्ड जब महाराजा गंगा सिंह से मिले तो महाराजा ने कहा कि अगर आप कहो तो इसके लिए एक कोशिश मैं कर लेता हूँ.


बाद में मांटेग्यू ने अपनी डायरी में लिखा कि मुझे नही पता महाराजा ने दुनिया के नेताओ से उस वक्त क्या कहा लेकिन कुछ ही देर बाद ब्रिटिश इंडिया का नाम भी लीग ऑफ नेशन में शामिल हो गया.


साभार : इस लेख के लिये तथ्यात्मक जानकारी श्री राजवीर सिंह चलकोइ (इतिहास विशेषज्ञ स्प्रिंगबोर्ड अकेडमी जयपुर) के एक वीडियो से ली गई है.


✍ लोकेन्द्र सिंह

Saturday, 8 May 2021

महाराणा प्रताप- पर्वतीय जीवन विशेष


भारत के हिन्दुआ सुरज, प्रातः वंदनीय महाराणा प्रताप सिंह की 481 वी जयंती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻


अभी कुछ दिन पहले एक राजनेतिक पार्टी विशेष के नेता द्वारा महाराणा प्रताप पर आपतिजनक बयान दिया गया चलिए आज  महाराणा प्रताप जंयती के अवसर पर उसी विषय पर थोडी जानकारी साझा करते हॆ के महाराणा प्रताप जंगलो मे भटकने की सच्चाई क्या हॆ 👇🏻


हल्दीघाटी से समबन्धित महाराणा प्रताप की गाथाएँ तो बडी महत्वपूर्ण हॆ लेकिन उनसे कही अधिक गॊरवपुर्ण वे गाथाए हॆ जो उनके पर्वतीय जीवन पर प्रकाश डालती हॆ,प्रताप के देशभिमान,स्वार्थत्याग,दुरदर्शिता,ऒर रणकॊशल के अध्ययन के लिए हमे उन घटनाओ को समझना चाहिए जिनका समबन्ध उनकी पहाडी स्थिती से हॆ,

इस स्थिति से सम्बन्धित घटनाए जॆसे महारानियो का चट्टानो पर सोना ,उनके पुत्र अथवा पुत्री की रोटी को बिलाव द्वारा छिना जाना इत्यादी बातो को बढा चढाकर लिखा गया हॆ ,हम जानते हॆ की  प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध ऒर उनके देहावसान के बीच का समय अधिकांश पहाडो पर गुजरा ,यदी हम प्रताप को समझना चाहते हॆ तो हमे उन पहाडो पर जाना होगा जहां वर्षो रहकर प्रताप ने मुगलो का मुकाबला किया ऒर अपने देश की सुव्यवस्था की,ये पहाड आजी भी प्रताप के सच्चे स्वरुप को हमारे सामने उपस्थित करते हॆ ।

हल्दीघाटी की पराजय को महाराणा प्रताप ने कभी पराजय नही माना बल्कि इस पराजय के बाद उन्होने पर्वतीय जीवन ऒर युद्ध नीती का नया पृष्ठ आरम्भ किया। लडाई के मॆदान से वे सीधे उन पहाडो मे गये जहा पानी ,अन्न,ओर ऒषधि उपबल्ध थी। इन पहाडो मे कोल्यारी नाम का गांव था वहा पहुंचकर उन्होने घायल सॆनिको का उपचार करवाया । इन्ही से उन्हे अपने देश की सुरक्षा की आशा थी । यह स्थान निर्जन वन मे था जहां मुगल सेना का पहुंचना कठिन था । यहां प्रताप ने पहले ही रसद एंव अन्य सुविधाओ को जुटाकर रखा था ।कुछ समय यहा रहकर उन्होने घायल सिपाहियो की देखभाल की ऒर उन्हे स्वस्थ बनाया।


इसके पश्चात भीतरी गिरवा के पहाडी नाको पर इन सिपाहियो  को लगाया जिन्होने गोगुन्दा मे टिकी हुई शाही सेना की रसद को बन्द कर दिया । विजयी मुगल एक तरह से यहां कॆदियो की भांति जीवन बिताने लगे ,अपने घोडो ऒर ऊंटो को मारकर  खाने लागे इसके अतिरिक्त वहां पॆदा होने वाला खट्टा आम ही उन मुगलो के जीवन का आधार बना ,विवश होकर मुगल सॆनिक छिप छिप कर भागने लगे ऒर इस प्रकार से मुगलो की विजय पराजय मे बदल गयी ,राजा मान सिंह आमेर एंव बदायुनी जब अजमेर पहुचे तो अकबर ने उनकी अपेक्षा की ऒर यह इस बात का प्रमाण हॆ की प्रताप की पर्वतीय नीती ने मुगलो की नीती को विफल बना गया था।


मुगलो को गोगुन्दा से निकालने से ही महाराणा प्रताप संतुष्ट नही थे ,उन्होने कुम्भलगढ से लगाकर सहाडा  तक तथा गोडवाल से लेकर आंसीद ऒर भॆसरोडगढ के पर्वतीय नाको पर भीलो की विश्वस्त पालो को बसा दिया जो दिन रात मेवाड की चोकसी करते थे ,इन भील जत्थो के साथ अन्य सॆनिक भी थे जो मुगलो को मेवाड मे घुसने से रोकते थे ,

इस सम्पुर्ण व्यवस्था को सफल बनाने के लिए महाराणा को राजप्रासाद के जीवन से तिलांजली देनी पडी ,वे पहाडी कन्दराओ ऒर जंगलो मे अपने परिवार के साथ रहना ही अपने जीवन का अंग बना लिया ,

कभी वे एक पहाडी पर थे तो कभी दुसरी पर ,यह मुगलो से छिपने की विधी न थी वरन एक नयी युद्ध पद्धति थी जिसने भविष्य मे होने वाले मुगल हमलो को विफल बना दिया 

इस पद्धति मे जमकर लडाई करने का कोई महत्व नही दिया जाता। जिसका परिणाम यह हुआ की मुगल जो मॆदानी लडाई मे अभ्यस्त थे वे इस प्रणाली को समझ ना सके, यही कारण था के कुतुबुद्दीनखां , मिर्जाखां, हाशिमखां शाहबाजखां आदि मुगल जो उतरोतर मेवाड की ऒर भेजे गये कभी सफल नही हो सके, यहां तक की अकबर खुद गोगुन्दा आया ऒर राणा प्रताप की तलाश मे लगा रहा परन्तु अपने प्रयत्नो को विफल होकर गुजरात की ऒर निकल गया।


महाराणा प्रताप की सफलता केवल नाकेबन्दी के कारण न थी ,उन्होने अपने पर्वतीय जीवन काल मे स्थानीय  जन समुदाय से अच्छा सम्बन्ध स्थापित कर लिया था ,महाराणा प्रताप के कठिन व्रत एव कष्टपुर्ण जीवन बिताने से लोगो को बडी प्रेरणा मिली ,वे महाराणा के आत्मीय बन गये ऒर हर प्रकार से उनको सहयोग देने लगे । एक तामपत्र के आधार पर यह प्रमाणित होता हॆ के इस पर्वतीय जीवन काल मे महाराणा सकुटुम्ब क ई दिन तक एक लुहार के घर मे रहे थे, उसके सॊजन्य ऒर आतिथ्य के सम्मान मे उन्होने उसे खेती के लिए भुमी भी दी थी ,जो उसके वंशजो के अधिकार मे अब तक थी 


इस पर्वतीय जीवन के काल मे महाराणा ने वे स्थान जो उनके आदेश से खाली कर दिये थे जहां शत्रुओ के द्वारा बडी हानी पंहुची थी या जिन्हे अग्नि का ग्रास बना दिया गया था उन्हे फिर से आबाद किया गया । उदाहरणार्थ पीपली,ढोलान,टीकड,आदि गांव जो उजड गये थे उन्हे फिर से बसाया गया ,लोगो को नयी जमीने दि गयी ,जमीन के नये पट्टे बना दिये गये ,ऒर जो पुराने पट्टे जल गये थे या लुप्त हो गये थे उनको पुन: मान्यता दी गयी 

इस नीती व प्रयत्नो को सफल बनाने के लिए प्रताप पहाडी इलाको मे ही रहते थे ,उदयपुर को राजधानी बनाकर या मोती नगरी के राजप्रासादो मे प्रताप नही रहे ,उन्होने जनता के आराम के लिए अपने आराम की परवाह नही की ,इस व्यवस्था से मेवाड का जनजीवन ,व्यापार,वाणिज्य, आदि साधारण स्थिति पर पहुंच गये ,मुगलो के हमलो की प्रगति भी धीरे धीरे शिथिल होती गयी ।


इस प्रकार जब मेवाड की हालत सुधरती चली गयी तो प्रताप ने सहाडा के जिले मे एक पर्वतीय भाग जिसे छप्पन इलाका कहते थे वहां लुणा चावण्डिया को परास्त कर अपने अधिकार मे लिया ,यह भाग चारो ऒर उंची पर्वतमाला  से घिरा हुआ था  जिसमे घने जंगल तथा पर्वत घाटियो ऒर नाको का बाहुल्य था 

सन 1985ई. मे महाराणा ने इस भाग मे स्थित चावण्ड नामक एक पहाडी कस्बे को अपनी राजधानी बनाया ,उनके जीवन काल तक ही नही वरन उनके सुपुत्र अमर सिंह के राज्यकाल मे 1615ई. तक चावण्ड मेवाड की राजधानी बना रहा ,यहां प्रताप ने अपने महलो का निर्माण करवाया तथा उसके आसपास सामन्तो की हवेलिया बनवाई ,महलो के खण्डर आज भी बताते हॆ कि उनमे विलासिता या वॆभव का कोई दिखावा नही रखा गया था उनकी बनावट मे सरल जीवन तथा सुरक्षा के साधनो को प्रधानता दी गयी थी,जगह जगह मोर्चो की सुविधाए ,की गयी ,

राजप्रासाद तथा हवेलियो के खण्डरो को देखने से प्रतीत होता हॆ की शासक तथा अधिकारी वर्ग के मकानो मे कोई विशेष अन्तर नही था । यदी अन्तर था तो केवल उनके आकार मात्र का ।


महाराणा प्रताप का अन्तिम जीवन भी इसी पर्वतीय भाग मे समाप्त हुआ ,चावण्ड से डेड मील के अन्तराल पर बण्डोली गांव के पास मे महाराणा का दाह संस्कार हुआ जहां एक स्मारक बनवाया गया ,आज यह स्मारक एक बांध के गर्भ मे हॆ बडे प्रयासो के बाद यह स्मारक पानी से उपर उठाया गया जो उस निर्भिक स्वतंत्रता के पुजारी की हमे याद दिलाता हॆ जिसने पर्वतीय जीवन बिताकर तथा कठोरता का हंसकर सामना कर अपने देश के मान ऒर मर्यादा की रक्षा की ।🙏

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साभार - विजय सिंह शेखावत (सिंगोद)


Saturday, 23 May 2020

बेटी भी श्रवण सी होती है..।।


एक बेटी श्रवण बनी है बोझ जिंदगी का ढोती है,
क्या विकासशील देश में मजदूरों की हालत यही होती है..।।

रोता मन रोती मेहनत धूप भी सूरज की रोती है,
शिखर दुपहरी में जब एक बेटी श्रवण बन चलती है..।।

धूप में जलता बचपन लेकिन राजनीति कुलर में सोती है,
चित्र देख उमड़ते ख्याल आखिर जिंदगी कितनी कठिन होती है..।।

मिल जाता है सरकार का साथ जिनके पास इसकी कीमत होती है,
ये भारत है मेरी जान यहाँ मजदूरों की किस्मत यूँ ही रोती है..।।

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

✍🏻 कुँवर चेतन सिंह चौहान "कलम"

Wednesday, 13 May 2020

निमूचाणा हत्याकांड - इतिहास के पन्नो से


अलवर का नीमूचाना कांड जिसमे 156 राजपूत किसानो को मशीनगन से भून दिया गया और 600 से ऊपर घायल हुए।

जलियांवाला कांड जिसमें लगभग ढाई सौ लोगो की मौत हुई थी उसके बाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था नीमूचाना में। महात्मा गांधी ने इसे जलियांवाला हत्याकांड से भी ज्यादा भयानक बताया था। भारत के इतिहास में किसी भी किसान आंदोलन में इतने लोग नही मरे जितने नीमूचाना में एक दिन में मारे गए। इसके बावजूद अगर आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो इस कांड के बारे में कोई खास जानकारी आपको नही मिल पाएगी। यहां तक कि भारत के किसान आंदोलनों या स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास भी आप पढ़ेंगे तो उसमे मुश्किल ही नीमूचाना कांड का जिक्र आपको मिलेगा।

यहां तक कि राजस्थान के किसान आंदोलनों या तथाकथित रियासत विरोधी/स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में भी इस कांड को पर्याप्त महत्व नही दिया जाता। राजस्थान में इतने कृत्रिम किसान आंदोलनो को 47 के बाद से पब्लिक डिस्कोर्स में  प्रसिद्धि दिलाई हुई है जिनमे जान माल की मामूली हानि हुई थी और उनके स्मारक बने हुए हैं, वर्षगांठ मनाई जाती हैं, इन आंदोलनों के नेता प्रसिद्धि पाकर मंत्री मुख्यमंत्री तक बने लेकिन इन सभी किसान आंदोलनों को मिलाकर भी उतनी जनहानि नहीं हुई जितनी अकेले नीमूचाना हत्याकांड में हुई लेकिन शायद ही इस कांड के शहीदों को याद किया जाता हो।नीमूचाना कांड को महत्व ना दिए जाने के पीछे खुद राजपूत समाज की उदासीनता भी कारण हैं क्योंकि स्थानीय राजपूत समाज मे इतिहास बोध ना के बराबर है।

अलवर रियासत क्योंकि अंग्रेजो के आगमन के कुछ समय पूर्व ही अस्तित्व में आई थी इसलिए वहां राजपूत जागीरदारों की संख्या अभी कम ही थी और जागीर भी बेहद छोटी थीं। 80% भूमि खालसा में थी। इस खालसा में बिसवेदार भी थे। बिसवेदार वो किसान होते थे जो खालसा में आते थे लेकिन उनको अपनी जमीन पर स्थायी मालिकाना हक मिला होता था। उन्हें कर ना चुकाने पर ही बेदखल किया जा सकता था। बिसवेदारो में ज्यादातर राजपूत थे जिन्हें सैनिक सेवा के बदले अलवर दरबार ने बिसवेदारी दीं थी। अंग्रेजो के अधीन होने के बाद राजपूत जागीरदारों और बिसेदारो पर दरबार की निर्भरता खत्म होने से दरबार और आम राजपूतो के संबंध और शिथिल हो गए।

1923-24 के नए भूमि बंदोबस्त में अलवर राज्य ने राजपूत किसानों के बिसवेदारी अधिकार जब्त कर लिये और कर की दरें बढ़ाकर 50% तक कर दी। यह अलवर दरबार द्वारा राजपूतो के साथ धोखा था जबकि रियासत को अब भी राजपूतो को अनिवार्य सैन्य सेवा में बुलाने का अधिकार था। राजपूतो को अनिवार्य सैन्य सेवा के कारण रियायतें दी जाती थीं। उन्हें अपना सामाजिक स्तर भी बनाए रखना होता था। ब्राह्मणो को भी दी जाती थीं हालांकि उन्हें सिर्फ ब्राह्मण होने के कारण रियायत मिलती थी। राज्य को उनसे कोई सेवा नही मिलती थी।

राज्य की इस व्यवस्था के विरुद्ध थानागाजी और बानसूर तहसील के राजपूत बिसवेदारो ने इकट्ठे होकर नई दरों पर कर नही देने और इसके विरुद्ध आंदोलन करने का निर्णय लिया। दबाव बनाने के लिए अक्टूबर 1924 में राजपूतो ने विभिन्न गांवों में बैठके की लेकिन इसका राज्य पर कोई असर नही हुआ।

इसके बाद आंदोलन के नेताओ ने राज्य के बाहर के राजपूतो का समर्थन जुटाने का निर्णय लिया। देशभर के राजपूतो से अपील की गईं। जनवरी 1925 में दिल्ली में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में अलवर से 200 राजपूत शामिल हुए। इन्होंने वहां अपनी व्यथा सुनाई और आंदोलन को समर्थन की अपील की। इन्हें अधिवेशन में सहानुभूति मिली और आंदोलन को जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिला।

इसके बाद यह आंदोलन तीव्र हो गया। गवर्नर जनरल के एजेंट को फरियाद की गई। लेकिन राज्य को कोई फर्क नही पड़ा। कर ना देने पर राज ने फसल जब्त कर लीं जिसे राजपूतो ने ताकत के बल छुड़ा लिया। अब राज सरकार द्वारा प्रतिकार की संभावनाओं को देखते हुए राजपूतो ने तलवार, भाले, बंदूक वगैरह जुटाने शुरू कर दिए। जो राजपूत अलवर राज के वफ़ादार थे और उसकी सबसे बड़ी ताकत थे वो ही अब अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। राजपूतो ने इस अन्याय का मुकाबला करने का फैसला किया।

आंदोलन का मुख्य केन्द्र नीमूचाना गांव था जिसके ठाकुर इस आंदोलन के मुख्य संगठन कर्ता थे। मई 1925 की शुरुआत में राजपूत बड़ी संख्या में इस गांव में जुटने शुरू हो गए। सरकार ने थानागाजी, बानसूर, मालाखेड़ा, राजगढ़, बहरोड़ थाना क्षेत्रो में हथियार लेकर घूमने पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार ने 7 मई को नीमूचाना गांव में वार्ता के लिए एक कमिशन भेजा जिसका असली उद्देश्य खुफिया जानकारी इकट्ठा करना था। इस कमिशन की वार्ता से कुछ हासिल नही हुआ और 6 दिन बाद 13 मई को राज्य की सेना ने गांव को चारों तरफ से घेर लिया और आंदोलन खत्म करने को कहा। 14 मई की सुबह सेना ने सारे रास्ते बंद कर बिना चेतावनी के गांव पर मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी और गांव को जलाकर राख कर दिया जिसमे 156 राजपूत किसान मारे गए और 600 से ज्यादा घायल हुए।

इस हत्याकांड की देशभर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। देशभर के समाचार पत्रों में लेख लिखे गए। महात्मा गांधी ने इसे जलियावांला से भी ज्यादा भयानक बताया। लेकिन क्योंकि अंग्रेजी राज के परिणामस्वरूप बने नए शहरी उच्च मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस के द्वारा राजपूतो को अस्पृश्य समझा जाता था इसलिए इस हत्याकांड की आलोचना की सिर्फ औपचारिकता निभाई गई। हालांकि सरकार ने हत्याकांड के बाद अपने फैसले वापिस लिए और मृतकों के परिजनों को मुआवजे दिए गए।

यह कहा जाता है कि अलवर महाराज पर अंग्रेज सरकार का दबाव था। अंग्रेज सरकार उन्हें हटाने के बहाने ढूंढती रहती थी। और असहयोग आंदोलन के बाद अंग्रेजी सरकार ने आंदोलनों से सख्ती से निपटने का फैसला किया हुआ था। लेकिन इस सबके बावजूद इतने बड़े हत्याकांड के लिए किसी भी बहाने से किसी को दोषमुक्त नही किया जा सकता।
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लेखक- पुस्पेंद्र राणा
साभार - वीरेंद्र प्रताप सिंह सोलंकी

Saturday, 18 April 2020

विश्वगुरु बनता मेरा हिंदुस्तान



कहते है कि समयचक्र खुद को दोहराता है और आज वही वक्त है जब मेरे देश का स्वर्णिम युग पुनः अपने तेज से प्रकाशित होने लगा है। एकतरफ जहां पूरी दुनिया कोरोना नामक संक्रमण से त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है वही दूसरी तरफ भारत के प्रयासों से बीमारी ने अबतक देश मे अपना विकराल रूप नही दिखाया है।

कहते है एक सर्वोत्तम नेतृत्व ही अपने देश को उन ऊंचाइयों पर ले जाता है जहां से पूरा विश्व नतमस्तक होकर उसे प्रणाम करने लगता है। आजसे पहले भी कई बार ऐसा हुआ है जब विदेशी शक्तियों ने हिंदुस्तान के आगे झुककर उसे नतमस्तक होकर प्रणाम किया है व हिंदुस्तान का साथ मांगा है। लेकिन आज समय अलग है स्तिथियाँ अलग है। जब मेडिकल क्षेत्र में महारथ हासिल कर चुके देश कोरोना के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गए तब एकमात्र देश भारत ने अब तक कोरोना को घुटनों पर लाकर टिका दिया।
देश की सरकार, पुलिस, फौज, स्वस्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी व अन्य कोरोना योद्धाओं ने जिस प्रकार अपने पूर्ण समपर्ण से देश का साथ दिया उसी का आज ये परिणाम है कि स्विट्जरलैंड जैसे देश ने अपने मैटरहॉर्न पर्वत को हिंदुस्तान के रंग में रंग दिया।

ये प्रमाण है कि मेरा देश आज फिरसे विश्वगुरु बनने को तैयार है और आने वाले समय में हिंदुस्तान पुनः विश्वशक्ति के रूप में अपने आपको स्थापित करेगा।

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जयहिंद
जय भारत

✍🏻 *कुँवर चेतन सिंह चौहान*

Thursday, 2 April 2020

लॉक डाउन - निर्णायक युद्ध




जैसा कि आप सबको पता है 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बाद 26  मार्च से सम्पूर्ण देश मे लॉक डाउन को लागू कर दिया था। कुछ लोगो को सरकार का ये फैसला सही लगा तो कुछ लोगो को गलत लेकिन असल मे लॉक डाउन की क्या आवश्यकता रही होगी जो मेरी सोच के अनुसार ये है-

लॉक डाउन का कारण- चीन के वुहान से निकले एक कोरोना वायरस (Covid-19) ने जब धीरे धीरे विश्व के महानतम देश जो विकसित है, जिनके पास सबसे बेहतरीन चिकित्साप्रणाली है उन्हें तेजी से अपनी चपेट में लेना शुरू किया और मौत का भयानक खेल शुरू हुआ तो भारत के पास इस वैश्विक समस्या से निपटने का एकमात्र रास्ता लॉक डाउन ही बचा था। बेशक भारतीय मेडिकल व्यवस्था भी कमजोर नही है लेकिन इतनी भी उन्नत नही की ऐसी परिस्तिथियो का मुकाबला सिर्फ मेडिकल इक्वेपमेंट्स के आधार पर कर सके इसलिए लॉकडाउन जैसी व्यवस्था को मजबूरन लागू करना ही एकमात्र उपाय रहा भारतीय सरकार के पास।

लॉकडाउन में कमी - बेशक लॉक डाउन ही एकमात्र उपाय था  भारतीय सरकार के पास लेकिन लॉकडाउन की घोषणा के समय गरीब और खासतौर से दिहाड़ी मजदूरों की तकलीफों पर खासा ध्यान न देने से भीड़ का अपने अपने गांवों की तरफ प्रस्थान करना लॉक डाउन की सबसे बड़ी कमी रही। यदि इस वर्ग को विश्वास में लेने का कार्य उचित समय पर और अधिक सजगता से होता तो दिल्ली जैसी हालात किसी भी जगह पर नही होते। लॉकडाउन के समय इन बारीकियों की ओर ध्यान न देना कुछ हद तक कमियां दर्शाता है।

लॉकडाउन का प्रभाव - जिसप्रकार सरकार ने लॉक डाउन की घोषणा की और सम्पूर्ण देश ने एकजुट होकर इसका समर्थन व पालन किया और वर्तमान में कर रही है उसका सीधा सीधा प्रभाव के रहा है कि कोरोना जैसी महामारी जिसने कुछ ही दिनों में अमेरिका जैसी व्यवस्थित व विकसित प्रणाली को घुटनों के बल पर ला दिया वो बीमारी भारत मे अपने उस विस्फोटक स्वरूप में अभी तक नही आ पाई है जिसका खौफ ना केवल भारतीय सरकार अपितु पूरे विश्व को था। ये वायरस अभी तक मुख्यत शहरों में ही सीमित है जिसका एकमात्र कारण सरकार द्वारा सही समय पर लॉक डाउन का फैसला लेना रहा क्योंकि अगर ये बीमारी एकबार गांवों में अपनी जड़ें जमाना शुरू कर देगी तो इसको सम्भालना व इससे बचना बहुत कठिन होगा। इस बीमारी के फैलने से जो स्तिथि उत्पन्न होगी वो बहुत भयावह होगी जिससे देश ना केवल आर्थिक रूप से अपितु मानसिक रुप से भी कई साल पिछड़ जाएगा।

अतः समस्त देशवासियों को आज मिलकर ये शपथ लेनी चाहिए कि जब तक ये विपदा पूर्णतः समाप्त नही हो जाती हमे सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा व सरकार के हर कदम का समर्थन करना होगा। सच्ची देशभक्ति दिखाना सिर्फ बॉर्डर पर जाना नही होता यदि इस विपत्ति काल में आप किसी भी प्रकार से देश की रक्षा करने में आप अपना योगदान दे रहे है तो निश्चित ही आप भी सच्चे देशभक्त है।

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जयहिंद जय भारत
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः
घर रहिए - सुरक्षित रहिए

✍🏻 कुँवर चेतन सिंह चौहान

Wednesday, 15 May 2019

अकबर को बताकर महान तुम्हे तनिक लाज न आई




जिसके नाम से अकबर सपनो में डर जाता था,
एक पड़े भाला तो भीमकाय शत्रु तुरन्त मर जाता था,
जिसकी गर्जना से पूरा आकाश शौर्य से भर जाता था,
वो नाम वीर शूरमा महाराणा कहलाता था,

 महाराणा हारें थे ये बात तुम्हे किसने बताई है,
अकबर महान बताते शिक्षामंत्री तुम्हे तनिक लाज न आई है..।।


हिंदुस्तानी होकर ना जाने क्यों मुगल तुम बन रहे हो,
आखिर किस बात का है घमंड किस अहम में तन रहे हो,
गलत पढ़ाकर आखिर कैसे शिक्षित युवा जन रहे हो,
आखिर क्यों विधर्मी होकर राष्ट्रवादियों से ठन रहे हो,

खुदके शूरमाओं पर उठा रहे उंगली कैसी शिक्षा पाई है,
अकबर महान बताते शिक्षामंत्री तुम्हे तनिक लाज न आई है..।।


जिसदिन रक्त राणा के वंशजों का फिरसे उबाल खायेगा,
पछताओगे तुम कुछ न तुम्हे समझ मे आएगा,
माफी मांगो महाराणा से नतमस्तक हो प्रणाम करो,
कभी तो पढाओं सच्चा इतिहास जाकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार करो,


महाराणा पर उंगली उठाकर तुमने राजस्थानी मिट्टी है लजाई,
अकबर महान बताते शिक्षामंत्री तुम्हे तनिक लाज न आई है..।।।।

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*कुँवर चेतन सिंह चौहान*

Sunday, 14 April 2019

फक्र-ए-हिन्द लेफ्टिनेंट जनरल हनूत सिंह



राजस्थान में बाड़मेर जाते वक़्त जोधपुर से लगभग 80 किलोमीटर के फ़ासले पर एक शहर है-बालोतरा. और इससे कुछ मील दूर है जसोल. विशुद्ध राजस्थानी संस्कृति वाले जसोल में आप अगर किसी बच्चे से भी पूछें कि स्वर्गवासी हुकम हनुत सिंह की ड्योढ़ी कहां है तो वह हाथ पकड़ आपको वहां छोड़ आएगा.


कौन हनुत सिंह? यह पूछने वाले यकीनन भारतीय सेना के सबसे गौरवशाली अफ़सरों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल ‘हंटी’ उर्फ़ हनुत सिंह से परिचित नहीं है. वे भारतीय सेना के उस ‘भीष्म पितामह’ से वाबस्ता नहीं हैं जिसने सेना में अपना सर्वस्व झोंकने के लिए विवाह नहीं किया. वे उस अधिकारी बारे में नहीं जानते जिसे भारतीय सेना का सबसे कुशल रणनीतिकार कहा जाता है, और वे उस हनुत सिंह को नहीं जानते जो गौरवशाली टैंक रेजिमेंट 17 पूना हॉर्स के कमांडिंग ऑफ़िसर (सीओ) थे. जो नहीं जानते वे अब याद रखें कि सन 1971 की लड़ाई के बाद पाकिस्तान की सेना ने 17 पूना हॉर्स को ‘फ़क्र-ए-हिन्द’ का ख़िताब दिया था. हैरत की बात नहीं, जनता ही नहीं सरकारें भी अब हनुत सिंह को भूल चुकी हैं.

भारतीय सेना के 12 सबसे चर्चित अफ़सरों की जीवनी ‘लीडरशिप इन द आर्मी’ के लेखक रिटायर्ड मेजर जनरल वीके सिंह लिखते हैं, ‘अगरचे कोई एक लफ्ज़ है जो हनुत सिंह के बारे में समझा सके तो वह है- सैनिक’. वे आगे लिखते हैं कि हनुत सेनाध्यक्ष तो नहीं बन पाए पर लेफ्टिनेंट कर्नल रहते हुए भी वे एक किंवदंति बन गए थे.

ऐसा 1971 में हुआ था जब हनुत सिंह 17 पूना हॉर्स के सीओ थे. बैटल ऑफ़ बसंतर की उस मशहूर लड़ाई में दुश्मन से घिर जाने के बावजूद अपने हर जूनियर ऑफ़िसर को एक इंच भी पीछे हटने के लिए मना कर दिया था. इसी लड़ाई में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को अद्मय साहस का परिचय देने पर मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला था. इसी जंग में शानदार नेतृत्व के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल हंटी को महावीर चक्र मिला था.


पर यहां ज़िक्र 1971 का नहीं, बल्कि 1986 का है जब भारतीय सेना इतिहास में सबसे बड़े युद्धाभ्यास ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ के चलते पाकिस्तान पर लगभग हमला करने से कुछ कदम ही पीछे रह गई थी और इसमें हंटी की अहम भूमिका थी.

ऑपरेशन ब्रासटैक्स

एक फ़रवरी 1986 को जनरल के सुंदरजी ने भारतीय सेना की कमान संभाली और राजस्थान से लगी हुई पाकिस्तानी सीमा पर तीनों सेनाओं का संयुक्त युद्धाभ्यास कराने की योजना बनाई. सुंदरजी बदलते दौर की युद्ध शैलियों, एयरफोर्स की एयर असाल्ट डिविज़न और रीऑर्गनाइस्ड असाल्ट प्लेन्स इन्फेंट्री डिविज़न को आज़माना चाहते थे. इस संयुक्त युद्धाभ्यास की कमांड लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह के हाथों में सौंपी गई. इससे पहले एक उच्च स्तरीय मीटिंग में हनुत सुंदरजी से किसी बात पर दो-दो हाथ कर चुके थे. तब फ़ौज में यह बात उड़ गई कि हनुत अब रिटायरमेंट ले लेंगे पर सुंदरजी नियाहत ही पेशेवर अफ़सर थे, उन्होंने हनुत का सुझाव ही नहीं माना, उन्हें प्रमोट भी किया था.

तयशुदा प्लान के तहत 29 अप्रैल, 1986 को हनुत ने भारतीय सेना की सुप्रतिष्ठित हमलावर 2 कोर की कमान संभाली और इसे लेकर राजस्थान की सीमा पर आ डटे. एक आंकड़े के मुताबिक़ लगभग डेढ़ लाख भारतीय सैनिक सीमा पर जमा हुए थे. हनुत ने अब तक जो भी सीखा था, उसे इस युद्धाभ्यास में इस्तेमाल किया. रोज़ नए अभ्यास कराये जाते, नक़्शे, सैंड-मॉडल बनाकर हमले की प्लानिंग की जाती और जवानों को गहन ट्रेनिंग दी जाती.

ब्रास टैक्स के कई चरण थे. जब यह युद्धाभ्यास चौथे चरण में पहुंचा तो उनकी कोर को उस प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ा जो अब तक नहीं हुआ था. भारत के तीखे तेवर देखकर पाकिस्तान में हडकंप मच गया. पाकिस्तानी सेना हनुत सिंह का युद्ध कौशल 1971 में देख चुकी थी जब बसंतर की लड़ाई में हनुत ने उनके 60 टैंक मार गिराए थे. इस युद्धाभ्यास को सीधे तौर पर संभावित भारतीय हमला समझा गया जिसकी वजह से पाकिस्तानी सरकार के पसीने छूट गए थे. कहते हैं कि पाकिस्तानी संसद में विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री रोज़ाना बयान देकर देश को भारतीय सैन्य ऑपरेशन की जानकारी देते थे.

इस ऑपरेशन ने अमेरिका तक की नींद उड़ा दी थी. पश्चिम के डिप्लोमेट्स भारत की पारंपरिक युद्ध की ताक़त से हैरान रह गए थे. उनके मुताबिक़ यह युद्धाभ्यास नाटो फ़ोर्सेस के अभ्यासों से किसी भी प्रकार कमतर नहीं था. बल्कि, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दक्षिण एशिया में यह तब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास था. पाकिस्तान ने ट्रैक 2 डिप्लोमेसी का इस्तेमाल किया और बड़ी मुश्किल से इस युद्धाभ्यास को रुकवाया.

सुंदरजी इसे सिर्फ़ एक अभ्यास की संज्ञा दे रहे थे पर जानकारों के मुताबिक़ इस युद्धाभ्यास का असल मकसद कुछ और ही था. इसके रुकने पर हनुत और उनके अफ़सर बड़े मायूस हुए. वीके सिंह लिखते हैं कि हनुत का पिछला रिकॉर्ड देखते हुए यकीन से कहा जा सकता है कि अगर हनुत को इजाज़त मिल जाती तो वे दोनों मुल्कों का नक्शा बदल देते.

सिक्किम में वीआईपी कल्चर बंद कर दिया

यह क़िस्सा 1982 का है जब हनुत सिंह मेजर जनरल बने और सिक्किम में तैनात 17 माउंटेन डिविज़न की कमान उनके हाथों में आई. सिक्किम के तत्कालीन गवर्नर होमी तल्यारखान की इंदिरा गांधी के साथ नज़दीकी के चलते सेना के उच्चाधिकारी उनकी हाज़िरी में खड़े रहते. उन दिनों जो भी सरकारी अधिकारी सिक्किम घूमने आते, वे सेना की मेहमाननवाज़ी का लुत्फ़ उठाते. हनुत ने यह सब बंद करवा दिया. बल्कि उन्होंने आने वाले सरकारी सैलानियों से सरकारी शुल्क वसूलना शुरू कर दिया.

20 साल बनाम एक साल

सिक्किम में फॉरवर्ड पोस्टों पर सेना का हाल ख़राब था. न रहने के लिए मुकम्मल इंतज़ाम था न बिजली की व्यवस्था थी. हनुत सिंह ने सेना के उच्चाधिकारियों को पत्र लिखकर हालात सुधारने की बात कही तो उनके रिपोर्टिंग ऑफ़िसर ने मना कर दिया. हारकर, जब उन्हें कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिली तो उन्होंने लकड़ियों से सैनिकों के लिए बैरक और शौचालय बनवाए. वहां पर जनरेटर लगवाए.

कुछ साल बाद जब उनका तबादला कहीं और हो गया तो विदाई के समय सैनिकों ने उन्हें एक मेमेंटो दिया जिस पर लिखा हुआ था, ‘जितना सैनिकों के लिए बाक़ी अफ़सरों ने 20 साल में किया है, आपने एक साल में कर दिखाया’. उनका मानना था कि एक सैनिक जितना अपने अफ़सर के लिए कुर्बानी देता है, उतना अफ़सर उसके लिए नहीं करते.

जूनियर अफ़सरों के मां-बाप हंटी से परेशान थे

हनुत सिंह का मानना था कि सैनिक अगर शादी कर लेता है तो परिवार सेवा देश सेवा के आड़े आती है. लिहाज़ा, वे आजीवन कुंवारे रहे. वे अपने जूनियर अफ़सरों को भी ऐसी ही सलाह देते. एक समय ऐसा भी आया कि उनकी यूनिट में काफ़ी सारे जवान और अफ़सर उनके इस फ़लसफ़े से प्रभावित होकर कुंवारे ही रहे. इस बात से जूनियर अफ़सरों के मां-बाप हनुत सिंह से परेशान रहते. कइयों ने शिकायत भी की पर उनकी सेहत पर इस तरह की शिकायतों का असर नहीं होता था.

बेबाकी

1971 की लड़ाई के बाद जब उन्होंने अपनी रिपोर्ट पेश की तो उसमें लिख दिया कि सेना के बड़े अफसर जंग ख़त्म होने से कुछ ही घंटे पहले बॉर्डर पर आये थे. इस बात से उनके उनके कई वरिष्ठ अफ़सर उसे नाराज़ हो गए पर हनुत को अपनी काबलियत का बख़ूबी अंदाज़ा था जिसके चलते वे किसी की परवाह नहीं करते. कई बार तो बात यहां तक बढ़ जाती कि उनके अफ़सर अपनी फ़जीहत रुकवाने के लिए बैठकें ख़त्म कर देते थे.

1971 में उनके कमांडिंग ऑफ़िसर अरुण श्रीधर वैद्य (बाद में सेनाध्यक्ष) ने एक बार जंग के दौरान उनसे हालचाल मालूम करने की कोशिश की तो हनुत ने कहलवा दिया कि वे ‘पूजा’ कर रहे हैं और अभी बात नहीं कर सकते!’ दरअसल, जंग के दौरान वे किसी भी प्रकार का दख़ल बर्दाश्त नहीं करते थे. हनुत सिंह की काबिलियत का अंदाज़ा से बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत में टैंकों की लड़ाई पर उनके लिखे दस्तावेज़ आज भी इंडियन मिलिट्री अकादमी में पढ़ाये जाते हैं.

इतनी काबिलियत के बावजूद हनुत सिंह सेनाध्यक्ष नहीं बनाए गए. कहते हैं कि जब उन्हें यह बात मालूम हुई तो वे बड़े ही धीर स्वर में बोले ‘यह मेरा नहीं देश का नुकसान है कि उन्होंने काबिलियत के बजाए किसी और चीज को प्राथमिकता दी है.’ यह तय है कि हर क़ाबिल अफ़सर सेनाध्यक्ष नहीं बनता और हर सेनाध्यक्ष क़ाबिल नहीं होता।

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साभार :- सत्याग्रह




Friday, 29 March 2019

मेरा राजस्थान




जहां के रेतीले धोरे भी सोना उपजाया करते है,
जहां के वीर शुरमे रणभेरी वचन निभाया करते है,
जहां शीश कटने पर धड़ लड़ जाया करते है,
प्रेम निशानी हेतु निज शीश तक कटवाया करते है,

अगले जन्म मुझे अगर जीवनदान मिले,
देश मिले भारत मेरा और मातृभूमि यही राजस्थान मिले..।।


जहां बचपन से ही त्याग बलिदान सिखाया जाता है,
जहां पालने में मातृभूमि का महत्त्व बताया जाता है,
जहां प्राणों से बढ़कर भी वचन निभाया जाता है,
प्रण की रक्षा हेतु एक राजा जंगल मे जीवन बिताया करता है,

हे ईश्वर अगले जन्म यही माता पिता और उनका नाम मिले,
देश मिले मुझे भारत मेरा ओर धरती राजस्थान मिले..।।

जिस भूमि पर पृथ्वीराज और वीर महाराणा ने जन्म लिया,
अकबर जैसे मुगलों का भी दम्भ चकनाचूर किया,
 जहां मीरा बाई जैसी भक्ति थी,
जहर पी लिया जिसने वो अद्भुत नारी शक्ति थी,

अगले जन्म मुझे यही वीरों की धरा महान मिले,
देश मिले मुझे भारत मेरा और मातृभूमि राजस्थान मिले..।।

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राजस्थान दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

कुँवर चेतन सिंह चौहान

Monday, 25 March 2019

मैं भारत के किसानों का दर्द सुनाने आया हूँ..।।


भूख मिटाई हमारी वो हम सबके भगवान बने,
पूरे विश्व के पटल पर भारत की पहचान बने,
जिसने लुटा दिया जीवन अपना देश की भूख मिटाने को,
लहू से सींचकर धरती वो धरतीपुत्र किसान बने..।।

आज उन्ही किसानो की दशा तुम सबको बताने आया हूँ
लाचार हुए किसान का दर्द तुम्हे सुनाने आया हूँ..।।


भूलकर परिवार अपना जो दिन रात हल चलाया करते है,
औरों का पेट भरने की खातिर खुद भूखे सो जाया करते है,
जिनके पांवों के छाले अक्सर लहू बहाया करते है,
उन किसान को आखिर क्यों राजनेता तरसाया करते है..।।

राजनीति के कारण बदहाल हुए किसान तुम्हे दिखाने आया हूँ,
आज धरती के भगवान का दर्द तुम्हे सुनाने आया हूँ..।।

जिसदिन भारत के ये किसान आपस मे मिल जाएंगे,
क्रोध के पुष्प जब इनके खेतों में खिल जाएंगे,
लुट चुके किसानों के जिसदिन त्रिनेत्र खुल जाएंगे,
उसदिन एक नही हजारों सिंहासन हिल जाएंगे..।।

तुम्हारी भूल का भयानक परिणाम समझाने आया हूँ,
मैं किसानों के दर्द का शोर सुनाने आया हूँ..।।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

जय जवान - जय किसान
कुँवर चेतन सिंह चौहान

Saturday, 9 March 2019

शौर्य का अहसास



बहुत दिनों के बिजी शेड्यूल के बाद थोड़ा सा वक्त टीवी देखने को मिला तो अनायास ही एक चेनल पर पद्मावत मूवी आ रही थी। मूवी अपने अंतिम चरण में थी और युद्ध व जौहर की तैयारी चल रही थी।

पद्मावत मूवी का नाम सुनते ही पिछले साल हुए दंगों, राजपूत आक्रोश व फ़िल्म के विरोध की छवि दिमाग मे घुमने लगती है। उन विरोधों में हम भी शामिल थे। रक्त पत्र से लेकर खुल्ला विरोध सबमे अगुवाई की। फिर भी फ़िल्म का रिलीज होना व रिलीज के बाद समर्थन व विरोध में कमेंट आना इन सबका दौर चालू हुआ। लगभग एक साल निकल गया मूवी देखने का मन ही नही हुआ फिर भी जब कल जौहर की तैयारी को देखा तो अपने आप ही आंखे उसपर टिक गई। बेशक फ़िल्म में इतिहास के साथ छेड़छाड़ हुई जिसको लेकर मन मे क्रोध था लेकिन क्षत्राणियों के जौहर को यूँ फिल्मी पर्दे पर देखकर ना जाने क्यों आंखे उसपर ही अटक गई। दिमाग इतिहास में हिचकोले खाने लगा और अपने आप उस समय के हुए उस जौहर की तस्वीर दिमाग मे उभरने लगी।

जौहर कुंड की ओर बढ़ती क्षत्राणिया ओर जय भवानी के लगे नारे देखकर रोंगटे खड़े हो गए। दिमाग मे एक ही ख्याल आने लगा कि जिस दृश्य को मात्र फिल्मी रूप में देखने पर रोंगटे खड़े होने लगे वास्तविकता में वो दृश्य कितना ओजपूर्ण रहा होगा। क्या माहौल रहा होगा उस समय चितौड़ दुर्ग का जब सभी क्षत्राणियां उस दहकती जौहर अग्नि की ओर आगे बढ़ रही थी।


उस समय की कल्पना मात्र से एक ऐसे गर्व का अहसास होने लगा जो सिर्फ राजपूतों में ही हो सकता है। उस अहसास को शब्दों में वर्णित नही किया जा सकता। हम किस कुल से सम्बन्ध रखते है क्या हमारी संस्कृति है और किस प्रकार हमने उन्हें जीवंत रखा है।

इन सब चिजो से जुड़ाव होना आवश्यक है। वर्तमान समय के जुड़ाव व जानकारी के अभाव में उन सांस्कृतिक मूल्यों को हम खोने लगे है जिनके लिए पूर्वजों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।

हमे खुद को व आने वाली पीढ़ी को अपने इन गौरवशाली इतिहास से और अपने संस्कृति से जोड़ना होगा ताकि हम इन बेशकीमती मूल्यों को खोने से बचा सके।

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क्षत्रिय धर्म युगे युगे

कुँवर चेतन सिंह चौहान
ठिकाना शाहजहांपुर (अलवर) राजस्थान

Monday, 18 February 2019

मैं हिन्द के शेरों का शौर्य सुनाने आया हूँ




भारतीय सेना को समर्पित एक छोटी सी रचना।
शीर्षक :- मैं हिन्द के शेरों का शौर्य सुनाने आया हूँ,



सन सैंतालीस से जो हुआ शुरू वो किस्सा तुम्हे बतलाता हूँ,
आओ आज तुम्हे मैं हिन्द की सेना का शौर्य दिखलाता हूँ,
वीरों की वीरता का एक एक बिंदु तुमझे समझाता हूँ,
अमर वीरता के शोणित से अंतर्मन को पिघलाता हूँ,

सेना ने जो करे स्थापित मैं वो कीर्तिमान बताने आया हूँ,
आज  हिन्द के शेरों का शौर्य सुनाने आया हूँ..।।

भारत के वीरों की वीरता को ये दुश्मन उस वक्त झेंप गए,
अपने झूठे वीरता के चोले को उतार जमीन पर फेंक गए,
दुनिया ने भी माना था लोहा कारगिल का,
जब सवा लाख सशस्त्र पाकिस्तानी घुटने अपने टेक गए,

मैं उसी विजय की आज तुम्हे याद दिलाने आया हूँ,
आज हिन्द के शेरों का शौर्य सुनाने आया हूँ..।।

ये वही सेना है जिससे पाकिस्तान पूरा थर्राता है,
जिसके आगे खुद सेनापति बाजवा नतमस्तक हो जाता है,
देख शौर्य वीरों का काली का खप्पर भी भर जाता है,
वीर अब्दुल हमीद से टकराकर अमरीकी टैंक मिट्टी में मिल जाता है,

मैं उन्ही वीरों के चरणों में शीश झुकाने आया हूँ,
आज हिन्द के शेरों का शौर्य सुनाने आया हूँ..।।

मत छेड़ो शेरों को कि अबके मौत तुम्हारी पक्की है,
ये हिन्द की सेना है ना समझ युद्ध मे कच्ची है,
पाकिस्तान मिट जाएगा नक्शे से बात ये मेरी सच्ची है,
आकर चरण चुम लो तुम भारत के यही बात तुम्हारे लिए अच्छी है,

मैं देश के वीरों के प्रति अपना फर्ज निभाने आया हूँ,
मैं हिन्द के शेरों का शौर्य सुनाने आया हूँ..।।

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

जय हिंद
जय भारत

कुँवर चेतन सिंह चौहान
ठिकाना शाहजहांपुर

Friday, 15 February 2019

अब तो सेना के हाथ खोल दो मोदी जी


पुलवामा हमले के बाद हर भारतीय के आक्रोश को व्यक्त करती आपके छोटे भाई कुँवर चेतन सिंह चौहान की एक रचना :-

शीर्षक  -  अब तो सेना के हाथ खोल दो मोदी जी

ना जाने कितने वीरों को ये मौत की नींद सुला चुकी,
आखिर क्यों ये राजनीति महाराणा वीर शिवाजी को भुला चुकी,
देखो तुम्हारी ये खामोशी पूरे देश को रुला चुकी,
एकबार फिर आतंकी हरकत घाटी को हिला चुकी,

अब तो वीर भगत सिंह की वाणी में तुम भी कुछ बोल दो मोदी जी,
केवल एक बार ही सही सेना के हाथ खोल दो मोदी जी..।।

देखो दुष्ट पापियों ने कैसा ये अत्याचार किया,
पीठ के पीछे हमारे  शेरों पर धोखे से वार किया,
एकबार फिर से इन जिहादियों ने इंसानियत को शर्मसार किया,
देश रक्षा में जा रहे सैनिकों का निर्मम संहार किया,

अपनी भुजाओं के बल पर इन दुष्टों को तोल दो मोदी जी,
एकबार ही सही लेकिन सेना के हाथ खोल दो मोदी जी..।।

बहुत हो गयी दोस्तीनीति इसको यहीं विराम करो,
अगर अब भी मित्रता दिखलाओ तो तुम भी घर मे आराम करो,
देश रक्षा हेतु अब कुछ कठोर निर्णय का एलान करो,
सबसे पहले इन आतंकिओं का जीना तुम हराम करो,

बजे बिगुल अब युध्द का रण का बजने दो ढोल मोदी जी,
कि बस अबके सेना के हाथ खोल दो मोदी जी..।।।।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
*कुँवर चेतन सिंह चौहान*
*ठिकाना - शाहजहांपुर*

Monday, 24 December 2018

जीत - हार के मायने - विधानसभा चुनाव राजस्थान


हमारी जीत क्या है?
जीत के मायने क्या है?


इन विधानसभा चुनावों में हम किस लिए लड़े थे?

कोंग्रेस को जिताने ओर अपने मंत्री बनाने के लिए?


नही।
हरगिज नही।


इस बार के चुनाव थे

अहंकार vs स्वाभिमान

सत्ता के मद में चूर उस पार्टी के रहनुमाओं के खिलाफ जिसने अपनी ही रीढ़ की हड्डी को कमजोर करने का कार्य किया। सीधे शब्दो में कहूँ तो राजपूत जो सदैव ही बीजेपी के हितकारी रहे है उनके द्वारा राजपूतो को हद से ज्यादा अनदेखा करने पर उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और अपने आप को जीवित महसूस कराना ही हमारी जीत है।

हम ना तो कोंग्रेस को जीताने के लिए लड़े ना अपना मंत्री बनाने के लिए, हम तो सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को ये अहसास कराने के लिए लड़े थे कि भाई जिस समाज को तुम अनदेखा कर रहे हो वो समाज ही तुम्हारी जीवनरेखा है अगर उसको ही खत्म करने का प्रयत्न करोगे तो तुम भी जीवित नही रह पाओगे।


ओर इस बात का अहसास करवा भी दिया। जहां राजपूत एकमत होकर बीजेपी के खिलाफ गए वहां बीजेपी का कंडीडेट हार गया और जहां राजपूतों का समर्थन मिला वहां जीत गया। मतलब साफ है राजपूत भी अब वोट बैंक बनने की ओर अग्रसर है।


तो फिर मंत्री पद न मिलने पर ये है तौबा क्यों?

अपने अस्तित्व से ज्यादा आवश्यक है क्या मंत्री पद


शायद नही तो फिर जीत का जश्न मनाइए और अपने जीवित होने का प्रमाण देकर अपने आपको राजनीतिक स्तर पर स्थापित कीजिये।

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*कुँवर चेतन सिंह चौहान*

Sunday, 30 September 2018

ऐसा वीर जिसने सेना में आगे रहने को अपना सिर काटकर फेंका था किले में



राजस्थान का इतिहास यहां के राजपूतों के हजारों वीरता की सच्ची गाथाओं के लिए भी जाना जाता है। उन्हीं गाथाओं मे से एक है जैत सिंह चुण्डावत की कहानी। मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह की सेना की दो राजपूत रेजिमेंट चुण्डावत और शक्तावत में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए एक प्रतियोगिता हुई थी। इस प्रतियोगिता को राजपूतों की अपनी आन, बान और शान के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर देने वाली कहावत का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है।
मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह की सेना में विशेष पराक्रमी होने के कारण चुण्डावत खांप के वीरों को ही युद्ध भूमि में अग्रिम पंक्ति में रहने का गौरव मिला हुआ था। वह उसे अपना अधिकार मानते थे। किन्तु शक्तावत खांप के वीर राजपूत भी कम पराक्रमी नहीं थे। उनकी भी इच्छा थी की युद्ध क्षेत्र में सेना में आगे रहकर मृत्यु से पहला मुकाबला उनका होना चाहिए। उन्होंने मांग रखी कि हम चुंडावतों से त्याग, बलिदान व शौर्य में किसी भी प्रकार कम नहीं है। युद्ध भूमि में आगे रहने का अधिकार हमें मिलना चाहिए। इसके लिए एक प्रतियोगिता रखी गई जिसे जीतने के लिए चुण्डावत ने अपना सिर खुद धड़ से अलग कर किले में फेंक दिया था।

सभी जानते थे कि युद्ध भूमि में सबसे आगे रहना यानी मौत को सबसे पहले गले लगाना। मौत की इस तरह पहले गले लगाने की चाहत को देख महाराणा धर्म-संकट में पड़ गए। किस पक्ष को अधिक पराक्रमी मानकर युद्ध भूमि में आगे रहने का अधिकार दिया जाए?

इसका निर्णय करने के लिए उन्होंने एक कसौटी तय की, जिसके अनुसार यह निश्चित किया गया कि दोनों दल उन्टाला दुर्ग (किला जो कि बादशाह जहांगीर के अधीन था और फतेहपुर का नवाब समस खां वहां का किलेदार था) पर अलग-अलग दिशा से एक साथ आक्रमण करेंगे व जिस दल का व्यक्ति पहले दुर्ग में प्रवेश करेगा उसे ही युद्ध भूमि में रहने का अधिकार दिया जाएगा।
प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए दोनों दलों के रण-बांकुरों ने उन्टाला दुर्ग (किले) पर आक्रमण कर दिया। शक्तावत वीर दुर्ग के फाटक के पास पहुंच कर उसे तोड़ने का प्रयास करने लगे तो चुंडावत वीरों ने पास ही दुर्ग की दीवार पर रस्से डालकर चढ़ने का प्रयास शुरू कर दिया। इधर शक्तावतों ने जब दुर्ग के फाटक को तोड़ने के लिए फाटक पर हाथी को टक्कर देने के लिए आगे बढाया तो फाटक में लगे हुए लोहे के नुकीले शूलों से सहम कर हाथी पीछे हट गया।
हाथी को पीछे हटते देख शक्तावतों का सरदार बल्लू शक्तावत, अद्भुत बलिदान का उदहारण देते हुए फाटक के शूलों पर सीना अड़ाकर खड़ा हो गया व महावत को हाथी से अपने शरीर पर टक्कर दिलाने को कहा जिससे कि हाथी शूलों के भय से पीछे न हटे।

एक बार तो महावत सहम गया, किन्तु फिर वीर बल्लू के मृत्यु से भी भयानक क्रोधपूर्ण आदेश की पालन करते हुए उसने हाथी से टक्कर मारी जिसके बाद फाटक में लगे हुए शूल वीर बल्लू शक्तावत के सीने में घुस गए और वह वीर-गति को प्राप्त हो गया। उसके साथ ही दुर्ग का फाटक भी टूट गया।

शक्तावत के दल ने दुर्ग का फाटक तोड़ दिया। दूसरी ओर चूण्डावतों के सरदार जैत सिंह चुण्डावत ने जब यह देखा कि फाटक टूटने ही वाला है तो उसने पहले दुर्ग में पहुंचने की शर्त जीतने के उद्देश्य से अपने साथी को कहा कि मेरा सिर काटकर दुर्ग की दीवार के ऊपर से दुर्ग के अन्दर फेंक दो। साथी जब ऐसा करने में सहम गया तो उसने स्वयं अपना मस्तक काटकर दुर्ग में फेंक दिया।
फाटक तोड़कर जैसे ही शक्तावत वीरों के दल ने दुर्ग में प्रवेश किया, उससे पहले ही चुण्डावत सरदार का कटा मस्तक दुर्ग के अन्दर मौजूद था। इस प्रकार चूणडावतों ने अपना आगे रहने का अधिकार अद्भुत बलिदान देकर कायम रखा।
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जय क्षात्र धर्म
जय भवानी
      🚩🚩🚩केसरिया क्रांतिकारी🚩🚩🚩
साभार :- गुमान सिंह चूंडावत पारडी

गुजरा जमाना - बदलाव की हकीकत


*गुजरा जमाना - बदलाव की हकीकत*


चलो आज एक हकीकत सुनाई जाए,
कुछ बीते जमाने की बाते बताई जाये,
कुछ असलियत इस बदलते वक्त की तुम्हे दिखाई जाए,
कुछ बातें पुरानी आज तुम्हे याद दिलाई जाए,

एक ऐसा गुजरा जमाना था,
जब सब यारो के बैठने का एक ठिकाना था,
रोज एक ही थाली में भाइयों का खाना था,
खाना क्या था साथ बैठकर बतलाने का एक बहाना था,

गांव के बीचों बीच एक चौपाल थी,
जहां से बनती राजीनीति की  सारी चाल थी,
रोज शाम को चिलम तम्बाकू का आभास था,
वही तो गांव में बुजुर्गों के होने का अहसास था,

रोज गौधुली वेला में गांव के युवा होते एक थे,
कुछ होती थी हंसी ठिठोली कुछ बनते कार्यक्रम नेक थे,
सभी युवाओं का बस एक सपना था,
की ये गांव नही एक पूरा परिवार अपना था,

लिखने को तो ना जाने और क्या क्या बातें लिख दूँ,
वो खेतों में कुएं पर नहाना ओर खेत में सोते हुए वो चांदनी राते लिख दूँ,
वो आसपड़ोस की भाभी का प्यार या घर के बुजुर्गों से पड़ती मार लिख दूँ,
या पड़ोसियों का अपनापन सगे सम्बन्धी जैसा व्यवहार लिख दूँ,

लिखने को बहुत कुछ है यार पर पढ़ने का वक्त कहाँ है,
स्वाभिमान पर उबाल खाता था जो वो अब रक्त कहाँ है,
वक्त की मार ने सोच बदली बदल दिए रहने के तरीके,
अब अपना घर आबाद रहे भाई चाहे बर्बाद रहे यही है जीने के सलीके...।।।।।।

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

*कुँवर चेतन सिंह चौहान (Chiksa)*

Saturday, 15 September 2018

एक राजपूत जिसे पूजता है मुस्लिम समाज - दौलत शाह मजार (दौलत सिंह शेखावत महरोली)

 


जोगीराम सिंह जी व दौलत सिंह जी दो भाई थे जो कि मूलतः ग्राम महरोली में जोध सिंह जी की कोटड़ी (छोटा पाना) में आते थे जोगीराम सिंह जी जयपुर दरबार के नोकरी करते थे और दौलत सिंह जी गांव में ही रहते थे उनके बड़े भाई जब भी जयपुर दरबार के यहां से छुट्टी पर गांव आते थे तो दौलत सिंह जी को डांट ते थे कि गांव में क्या करता है चल में जयपुर दरबार के यहां नोकरी लगा देता हूं फिर कुछ समय बाद वो भी जयपुर दरबार के यहां नोकरी लग जाते है पर उनके बड़े भाई जोगीराम जी जगदीश जी भगवान जिनका मंदिर अजीतगढ़ के पास स्थित है जगह मुझे ज्ञात नही पर जगदीश जी महाराज के जोगीराम जी परम् भक्त थे वो उस भक्ति में लीन हो गए उनकी पूजा पाठ करने लगे  फिर उधर दौलत सिंह जी जो को जयपुर दरबार के यहां नोकरी करने लग गए थे तो उस समय जयपुर रियासत मीणो से खूब युद्ध करा करती थी तो ऐसा ही एक युद्ध मीणो से चोमू के पास हुआ उस युद्ध  में दौलत सिंह जी ने एक वीर योद्धा की तरह युद्ध लड़ा उनका सर धड़ से अलग होने के बावजूद वो लगातार लड़े और आखिर कर उनका शरीर चोमू में उस जगह गिरा जहां आज उनकी मजार बनी हुई है । मजार बनने के मामले में कई मतभेद है कोई कह रहा है कि उनकी शमाधि की सेवा एक मुसलमान ने की इस वजह से धीरे धीरे नाम दौलत साह हो गया और कोई कह रहा है कि आखिरी सांस के समय उन्होंने मुसलमान से मदद मांगी तो मुस्लिम ने मदद की उनकी मजार बना दी । अब दौलत सिंह जी वीर गति को प्राप्त हो गए तो जयपुर राजघराने उस योद्धा को कोई मान नही दिया उनके परिवार तक कि सूद भी नही ली तो उनके परिवार वालो ने उनके बड़े भाई जोगीराम जी को खूब कोसा की तू ही उनको लेके गया वहाँ और खुद छोड़ के आगया   अब जोगीराम जी जगदीश जी महाराज के परम भक्त थे शक्तियां उनमे विराजमान थी उनको राजघराने पे गुस्सा आया और रातो रात अकेले ही चांदपोल का गेट उतार के जगदीश जी के मंदिर में लगा दिया ये कारनामा करने के बाद वो वापस भक्ति में लीन हो गए फिर जब जयपुर दरबार को ये बात पता लगी तो उन्होंने 50 योद्धाओ की एक टुकड़ी भेजी उनको लाने के लिए और उस टुकड़ी में जो योद्धा गए वो भी डरे हुए थे कि जो चांदपोल का गेट उतार सकता है वो कुछ भी कर सकता है तो उस टुकड़ी की सेना ने उनपे हमला उस समय किया जब वो भक्ति में लीन थे और उनकी गर्दन काट के जयपुर दरबार के सामने जब पेश की तो ज्यो ही कपड़ा उस गर्दन से हटाया तो चेहरा घूम गया ये देख के जयपुर दरबार अचंभित हुए और बोले किस वीर योद्धा की गर्दन लेके आगये तो जब दरबार को हकीकत मालूम पड़ी की ये भक्ति में लीन थे धोखे से इन्होंने इनकी गर्दन काट दी तो जयपुर दरबार काफी नाराज हुए और उन्होंने उस टुकड़ी में शामिल 50 के 50 यौद्धा को शूली पे लटका दिया। आज इस मजार पर ना केवल मुस्लिम अपितु हिन्दू भी माथा टेकने व अरदास माँगने जाते है।
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Source - कुँवर अजय सिंह शेखावत महरौली

जय क्षात्र धर्म
जय माँ भवानी

                       *केसरिया क्रांतिकारी*